Swami Avdheshanand engagement report
@AvdheshanandG - 322K followers on X
Measured over 48 original posts from a 30-day window, last computed on October 12, 2026.
Engagement
A typical post picks up 417 interactions against 322K followers, an engagement rate of 0.13%. Measured over 48 original posts, its engagement rate beats 75% of 21,185 tracked accounts of a similar size, which puts it in the middle of its size range rather than at either end. Posts are seen about 4.8K times each, and 8.61% of those impressions turn into an interaction. That is about 1.50% of the follower count, which is the gap between an audience on paper and an audience in a timeline. Posting runs at about 1.6 posts a day over the last 30 days, with activity on almost every day in the window. Most posts go out around 01:00 UTC, and Wednesday is the busiest day of the week. Of the 48 posts sampled, 100% carry an image or video. The account's strongest tracked post pulled 3.1K interactions, about 7.5x its own typical post.
Measured over 48 original posts from a 30-day window, last computed on October 12, 2026.
Compared with accounts its own size
Swami Avdheshanand's engagement rate beats 75% of the tracked X accounts closest to it in follower count (21,185 accounts, accounts of similar size (decile 10 of 10)). A percentile is spread evenly by construction, so 50 really is the middle of that group and 90 really is its top tenth.
On engagement per impression rather than per follower it beats 97% of the same group. When those two numbers disagree, the gap is about how far its posts travel rather than how people react to them.
Where this sits in the catalog
At 0.13%, Swami Avdheshanand sits above the 25th percentile of the 212,741 accounts in this comparison. That places it in the below the median band, which runs 0.025% to 0.146%.
Show the percentile table
| Percentile | Engagement rate |
|---|---|
| 10th percentile | 0.004% |
| 25th percentile | 0.025% |
| 50th percentile | 0.146% |
| 75th percentile | 0.697% |
| 90th percentile | 2.61% |
| 99th percentile | 82.8% |
This ruler is the whole measured catalog, not a size-matched group: it shows where the raw rate falls across every account we can measure, all of which are large. For a like-for-like comparison, read the size-band percentile above instead. See how the bands are built
Posting timing
This account posts most often around 01:00 UTC, and Wednesday is its busiest day of the week. The bars below are the catalog-wide pattern, with this account's own busiest slot marked. They do not show how this account performs at each hour: we keep one aggregate per account, not one per hour, so that measurement does not exist in our data.
Show engagement by hour posted, utc as a table
| Hour (UTC) | Vs author median | Posts |
|---|---|---|
| 00:00 UTC | -1% | 89K |
| 01:00 UTC | -2% | 90K |
| 02:00 UTC | -3% | 88K |
| 03:00 UTC | -4% | 94K |
| 04:00 UTC | -5% | 76K |
| 05:00 UTC | -4% | 75K |
| 06:00 UTC | -5% | 86K |
| 07:00 UTC | -5% | 93K |
| 08:00 UTC | -4% | 108K |
| 09:00 UTC | -4% | 124K |
| 10:00 UTC | -3% | 129K |
| 11:00 UTC | -3% | 141K |
| 12:00 UTC | -3% | 154K |
| 13:00 UTC | -3% | 167K |
| 14:00 UTC | -4% | 173K |
| 15:00 UTC | -2% | 176K |
| 16:00 UTC | -3% | 171K |
| 17:00 UTC | -3% | 159K |
| 18:00 UTC | -2% | 149K |
| 19:00 UTC | -2% | 141K |
| 20:00 UTC | -1% | 131K |
| 21:00 UTC | 0% | 116K |
| 22:00 UTC | -2% | 100K |
| 23:00 UTC | -1% | 90K |
Show engagement by day of week as a table
| Day | Vs author median | Posts |
|---|---|---|
| Sunday | +5% | 393K |
| Monday | +1% | 483K |
| Tuesday | -2% | 520K |
| Wednesday | -3% | 472K |
| Thursday | -2% | 430K |
| Friday | -3% | 447K |
| Saturday | +2% | 393K |
Formats this account uses
Its own posting mix on the left, and what each of those formats does across every account we track on the right. Only formats where the effect clears our publish test appear here, so an empty row is a format we could not measure rather than one that does nothing.
| Format | This account | Catalog effect | 95% interval | Accounts behind it |
|---|---|---|---|---|
| Image or video | 100% of posts | +111% | +108% to +115% | 34K |
| Outbound link | 0% of posts | -41% | -42% to -40% | 32K |
| Typical length | - | +15% | +14% to +16% | 32K |
- 100% of this account's sampled posts carry an image or video. Across the catalog, posts with an image or video run 111% above the same accounts' other posts.
- 0% of its posts carry a link off X. Across the catalog, posts with an outbound link run 41% below the same accounts' other posts.
- Its average post runs 3509 characters, which falls in the over 280 characters band. Across the catalog, posts over 280 characters run 15% above the same accounts' other posts.
These are catalog-wide differences applied to this account's own posting mix, not a measurement of how each format performs for this account specifically. We keep one median per account, not one per format per account, so the second thing is not something this data can tell you.
Best tweets
- Aug 1, 20267.5x their median
मर्यादित भाषा ही भारत की आत्मा है ! भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, अपितु एक सनातन सांस्कृतिक चेतना है। यह वह पुण्यभूमि है जहाँ मानव-जीवन को केवल अधिकारों के आधार पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों, मर्यादाओं, सदाचार और पारस्परिक सम्मान के आधार पर परिभाषित किया गया है। हमारी सनातन संस्कृति का मूल स्वर यही है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दिव्यता का वास है, अतः प्रत्येक के प्रति आदर, विनम्रता और शिष्टाचार का व्यवहार होना चाहिए। वेदों ने हमें सिखाया कि “संगच्छध्वं संवदध्वं” साथ चलो, साथ विचार करो और संवाद के माध्यम से समाज का निर्माण करो। भारतीय परम्परा में मतभेद स्वीकार्य हैं, किन्तु मनभेद नहीं; विचारों का प्रतिवाद स्वीकार्य है, किन्तु व्यक्तियों का अपमान कभी स्वीकार्य नहीं रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति व्यक्त करने, प्रदर्शन करने तथा शासन की नीतियों की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है। यही लोकतंत्र की शक्ति और उसकी गरिमा है। किन्तु जब विरोध की अभिव्यक्ति मर्यादा की सीमा का अतिक्रमण कर अशोभनीय, अपमानजनक अथवा अमर्यादित भाषा का रूप धारण कर लेती है, तब वह केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का भी अवमूल्यन करती है। हाल के दिनों में सार्वजनिक मंचों पर माननीय प्रधानमंत्री के प्रति जिस प्रकार की अभद्र, अशिष्ट और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया; विशेषतः उनकी स्वर्गीया पूज्या माताजी के प्रति जिस प्रकार के असम्मानजनक शब्द कहे गए, वे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सनातन जीवन-दृष्टि के सर्वथा प्रतिकूल हैं। किसी भी मतभेद, वैचारिक संघर्ष अथवा राजनीतिक असहमति का समाधान कभी भी अपशब्दों से नहीं हो सकता। ऐसी भाषा न लोकतंत्र की मर्यादा है और न ही भारत की आत्मा। हमारी संस्कृति तो यह सिखाती है कि विरोधी के प्रति भी संयम, शिष्टाचार और गरिमा बनी रहे। रामायण में युद्धभूमि के मध्य भी मर्यादा का पालन है; महाभारत में भीषण संघर्ष के बीच भी संवाद और सम्मान की अनेक परम्पराएँ दिखाई देती हैं; श्रीमद्भागवत करुणा, क्षमा और सद्भाव का संदेश देती है। भारतीय परम्परा में तो शत्रु के प्रति भी अपमानजनक भाषा का समर्थन नहीं किया गया। संपूर्ण संत समाज और आध्यात्मिक जगत ऐसे अमर्यादित शब्दों से अत्यंत आहत है। हमारी स्पष्ट मान्यता है कि सार्वजनिक जीवन में आसीन किसी भी व्यक्ति के साथ असहमति हो सकती है, किन्तु उसके प्रति अशिष्ट, अपमानजनक और निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक पदों की गरिमा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। पद का सम्मान किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान है। भारतीय संस्कृति का वैश्विक परिचय ही हमारी विनम्रता, शालीनता और उदात्त दृष्टि है। संसार हमें ऋषि-मुनियों की संतति के रूप में जानता है। हम वह सभ्यता हैं जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उद्घोष करती है; जो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन करती है; जो वृक्ष, वनस्पति, पशु-पक्षी और समस्त सृष्टि के प्रति भी करुणा एवं सम्मान का भाव रखती है। जब हमारी संस्कृति इतनी व्यापक और उदात्त है, तब हमारी भाषा भी उसी गरिमा का प्रतिबिंब होनी चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि विशेषकर युवा पीढ़ी यह समझे कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार का दर्पण है।जिस समाज की भाषा मर्यादित होती है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल होता है।कटुता, अपमान और अशिष्टता कभी भी स्थायी समाधान नहीं देती; संवाद, विवेक और शालीनता ही राष्ट्र को आगे ले जाते हैं। देश के विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आदरणीय प्रधानमन्त्री जी की संवेदनशीलता सजगता स्तुत्य है। उनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी, गुणवत्तापूर्ण तथा विद्यार्थी-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से अनेक सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं, ताकि शिक्षा व्यवस्था अधिक सुदृढ़ हो, विद्यार्थियों के हितों की बेहतर रक्षा हो तथा उनके भविष्य के साथ किसी प्रकार का अन्याय न होने पाए। किसी भी नीति या व्यवस्था का उद्देश्य यही होना चाहिए कि विद्यार्थियों को निष्पक्ष, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक वातावरण प्राप्त हो तथा उनके जीवन-निर्माण की प्रक्रिया अधिक सशक्त बने। हम उन सभी व्यक्तियों के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं जिन्होंने द्वेषपूर्वक आहत करने वाली अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि-सद्विचार-सद्विवेक प्रदान करें ताकि वे भारत की महान सांस्कृतिक परम्पराओं, मान-मर्यादाओं, नैतिक मूल्यों व लोकतांत्रिक आदर्शों का सम्मान करते हुए राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा सकें। @narendramodi @PMOIndia
- Sep 17, 20267.3x their median
भारत केवल एक भौगोलिक अथवा राजनीतिक इकाई नहीं, अपितु सनातन सांस्कृतिक चेतना और मानवता के आध्यात्मिक उत्कर्ष की दिव्य प्रयोगभूमि है। इस पुण्यभूमि ने विश्व को वेदों का ज्ञान, उपनिषदों का आत्मबोध, भगवान श्रीराम की मर्यादा, भगवान श्रीकृष्ण का कर्मयोग और भगवत्पाद आदि शंकराचार्य का अद्वैतबोध प्रदान किया है। भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का मूल स्वर सत्ता नहीं, साधना है; अधिकार नहीं, कर्तव्य है और शासन नहीं, लोकमंगल है। इतिहास के प्रत्येक निर्णायक मोड़ पर भारत को ऐसा नेतृत्व प्राप्त हुआ है, जिसने राष्ट्र के अंतर्मन में सुप्त आत्मविश्वास को जाग्रत किया। वर्तमान युग में आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी का नेतृत्व इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण का महत्त्वपूर्ण अध्याय है। उनके व्यक्तित्व में सेवा की संवेदना, संकल्प की दृढ़ता, साधक का अनुशासन, प्रशासक की दक्षता और राष्ट्रनायक की दूरदर्शिता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। 17 सितम्बर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे श्री नरेन्द्र मोदी जी की जीवनयात्रा संघर्ष, आत्मनिर्भरता और सेवाभाव से अनुप्राणित रही है। संगठन तथा समाजसेवा से आगे बढ़ते हुए उन्होंने वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री का दायित्व ग्रहण किया। वर्ष 2014 में वे भारत के प्रधानमंत्री बने और 9 जून 2024 को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।वर्ष 2026 में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनकी निरंतर जनसेवा की यात्रा पच्चीस वर्ष पूर्ण कर रही है। उनके जन्मदिवस पर उनका अभिनंदन वस्तुतः उस कर्मनिष्ठ जीवन-दृष्टि का सम्मान है, जिसने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर राष्ट्रसेवा को प्रतिष्ठित किया। उनका उद्घोष “राष्ट्र प्रथम” मात्र राजनीतिक नारा नहीं, अपितु उनकी कार्यपद्धति का केंद्रीय सूत्र है।उनकी जीवनचर्या में कठोर परिश्रम, समयानुशासन, योग-साधना और निरंतर सक्रियता दिखाई देती है। भारतीय शासन-दर्शन का सर्वोच्च उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख, सुरक्षा, सम्मान और अवसर पहुँचाना है। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसे प्रयासों ने जनकल्याणकारी प्रशासन को नई गति प्रदान की है। इनका महत्त्व केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि उस मानवीय गरिमा में है, जो किसी निर्धन परिवार को घर, किसी माता को धुएँ से मुक्ति और किसी रोगी को उपचार मिलने से उत्पन्न होती है। नारीशक्ति को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाना तथा महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सहभागिता को प्रोत्साहित करना भी व्यापक सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलमार्गों, हवाई अड्डों, मेट्रो नेटवर्क और सीमावर्ती सड़कों का विस्तार नवभारत की गतिशीलता का परिचायक है।पूर्वोत्तर भारत, आकांक्षी जिलों और ग्रामीण अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के सूत्र को व्यावहारिक रूप प्रदान करता है। डिजिटल इंडिया, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और यूपीआई ने शासन तथा आर्थिक व्यवहार को व्यापक रूप से परिवर्तित किया है। स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने उद्यमिता, विनिर्माण एवं नवाचार को प्रोत्साहन दिया है। चंद्रयान-3 की सफलता और गगनयान की तैयारियाँ भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति हैं। रक्षा-उत्पादन और स्वदेशी तकनीक पर बल ने राष्ट्रीय सुरक्षा को भी सुदृढ़ किया है। प्रधानमंत्री जी ने विकास और सांस्कृतिक विरासत को परस्पर विरोधी मानने वाली मानसिकता को चुनौती दी है।अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण और श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा करोड़ों भारतीयों की शताब्दियों पुरानी आस्था की ऐतिहासिक परिणति बनी।काशी विश्वनाथ धाम, श्रीमहाकाल महालोक और केदारनाथ धाम का विकास सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं। योग और भारतीय ज्ञान-परम्परा को वैश्विक प्रतिष्ठा मिलने से भारत की सभ्यतागत चेतना को नया आत्मविश्वास प्राप्त हुआ है। उनके नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता और विश्वबंधुत्व का समन्वय दिखाई देता है। जी-20 की अध्यक्षता में “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” का ध्येयवाक्य “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना का वैश्विक उद्घोष बना। “आज का युग युद्ध का नहीं है” उनका यह संदेश भारत की संवाद, सहअस्तित्व और विश्वशांति पर आधारित सनातन दृष्टि को अभिव्यक्त करता है। मृत्युंजय महादेव के अनुग्रह से आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, अक्षय ऊर्जा और राष्ट्रसेवा के लिए निरंतर सामर्थ्य प्राप्त हो।जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएँ ! @narendramodi #सेवा_संकल्प_अभियान #AshirwadKaDiya
- Oct 1, 20262.9x their median
प्राणघातक संकट और गंभीर चोटों के बीच भी कैप्टन स्मित मच्छार जी ने अदम्य शौर्य, विलक्षण सूझबूझ और अडिग कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। अपने प्राणों की चिंता से ऊपर उठकर उन्होंने यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च स्थान दिया। उनके साहसिक प्रयासों ने 174 यात्रियों की जीवनरक्षा और एक भीषण त्रासदी को टालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जब संकट के सम्मुख साहस अडिग रहता है और कर्तव्य स्वयं के जीवन से भी अधिक मूल्यवान हो उठता है, तब मानवता अपने श्रेष्ठतम स्वरूप में प्रकट होती है। कैप्टन स्मित का यह पराक्रम उसी उदात्त भावना का उज्ज्वल उदाहरण है। उनके शौर्य पर समूचे राष्ट्र को गर्व है; उनकी वीरता और समर्पण को मेरा सादर नमन। भगवान मृत्युंजय महादेव और माँ ललिता राजराजेश्वरी से प्रार्थना है कि वे उन्हें शीघ्र पूर्ण स्वास्थ्य, अक्षय आत्मबल और दीर्घायु प्रदान करें। जय हिंद! 🇮🇳 #Captain_Smit_Machchhar @narendramodi @PMOIndia
- Sep 27, 20262.5x their median
श्रद्धेय अशोक सिंघल जी : राष्ट्रसेवा की अखण्ड साधना ! किसी व्यक्ति के जीवन की ऊँचाई केवल उसके पद से नहीं मापी जाती; वह उस ध्येय से पहचाना जाता है जिसके लिए उसने अपना समय, सामर्थ्य और समूचा जीवन अर्पित किया हो। श्रद्धेय अशोक सिंघल जी ऐसे ही ध्येयनिष्ठ व्यक्तित्व थे। उनकी जन्मशताब्दी के अवसर पर उन्हें सादर नमन। युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अशोक जी ने आगे चलकर प्रचारक के रूप में अपना जीवन समर्पित किया। प्रचारक का जीवन त्याग और सेवा का संकल्प है ; निजी सुविधा से ऊपर उठकर समाज के बीच रहना, लोगों को जोड़ना और निरन्तर कार्य करते रहना। संघ में अर्जित इसी अनुशासन, संगठन-कौशल और सेवाभाव को उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद के कार्य में लगाया। उनके नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद का कार्य व्यापक हुआ। संतों का मार्गदर्शन, कार्यकर्ताओं का परिश्रम और समाज की आस्था इन सबको जोड़ने की उनकी क्षमता असाधारण थी। उन्होंने समझा कि कोई भी सांस्कृतिक संकल्प केवल उद्बोधनों से आगे नहीं बढ़ता; उसे जन-जन के विश्वास और वर्षों की सतत साधना की आवश्यकता होती है। श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन में उनकी भूमिका इसी दृढ़ता और संगठन-शक्ति का परिचय देती है। भारतीय चिन्तन में सेवा का भाव मनुष्य को अपने सीमित स्वार्थ से ऊपर उठाता है। जब व्यक्ति अपने श्रम को लोकहित के लिए अर्पित करता है, तब उसका कर्म साधना बन जाता है। अशोक जी के जीवन को इसी भाव से देखा जा सकता है। उनके लिए राष्ट्र और संस्कृति के प्रति निष्ठा किसी अवसर विशेष की अभिव्यक्ति नहीं, प्रतिदिन निभाया जाने वाला व्रत थी। सादगी उनके आचरण में थी और अपने ध्येय के प्रति अडिग विश्वास उनके कार्य में। इसी सेवामय जीवन का स्मरण करते हुए आज अशोक सिंघल फाउंडेशन के तत्वावधान में उनकी जन्मशताब्दी के कार्यक्रमों का शुभारम्भ हुआ। समारोह में फाउंडेशन के संरक्षक, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद गुरुदेव स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज सहित देश के अनेक पूज्य संतों का आगमन हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत के गृह मंत्री आदरणीय श्री अमित शाह जी उपस्थित रहे। परम पूज्य युगपुरुष महामण्डलेश्वर स्वामी परमानन्द जी महाराज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह आदरणीय श्री दत्तात्रेय होसबाले जी, विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष आदरणीय श्री आलोक कुमार जी, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री आदरणीय श्री केशव प्रसाद मौर्य जी, आनन्दअखाड़ापीठाधीश्वर पूज्यपाद अनंतश्रीविभूषित आचार्य महामण्डलेश्वर पूज्यपाद स्वामी बालकानन्द जी महाराज तथा परम आदरणीया साध्वी ऋतम्भरा जी सहित अनेक पूज्य संत सत्पुरुषों ने समारोह की गरिमा बढ़ाई। अशोक सिंघल फाउंडेशन के संस्थापक आदरणीय श्री महेश भागचंदका जी, विश्व हिन्दू परिषद की प्रान्त अध्यक्षा आदरणीया श्रीमती उपासना अरोड़ा जी सहित अनेक गणमान्यजन, संघ के आनुषंगिक संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी उपस्थित रहे। श्रद्धेय अशोक सिंघल जी की स्मृति हमें प्रेरित करती है कि बड़े संकल्प धैर्य की अपेक्षा रखते हैं। उनके पीछे अनगिनत कार्यकर्ताओं का श्रम, परस्पर विश्वास और दीर्घकालीन समर्पण होता है। अशोक जी ने स्वयं कार्य किया, कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया और समाज की शक्ति को एक व्यापक उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी जन्मशताब्दी पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि। #अशोक_सिंहल #विश्वहिंदूपरिषद #राष्ट्रीय_स्वयंसेवक_संघ
- Aug 9, 20262.2x their median
लंदन, इंग्लैंड। सुप्रसिद्ध उद्योगपति एवं "वेदान्ता समूह" के संस्थापक-चेयरमैन आदरणीय श्री अनिल अग्रवाल जी के स्नेहिल आमंत्रण पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद गुरूदेव श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “आचार्यश्रीजी” 08 अगस्त, 2026 की सायंकाल उनके मेफेयर, लंदन स्थित निवास पर पधारे। इस आत्मीय भेंट के प्रारम्भ में "पूज्य आचार्यश्री" ने श्री अनिल अग्रवाल जी के दिवंगत पुत्र की पुण्यस्मृति में भावपूर्ण प्रार्थना की तथा परमात्मा से दिवंगत आत्मा की शान्ति और परिवार को आत्मबल प्रदान करने की मंगलकामना की। इसके पश्चात श्री अनिल अग्रवाल जी एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण अग्रवाल जी के साथ "पूज्य आचार्यश्री" का अध्यात्म, उद्योग, पुरुषार्थ, सेवा, परोपकार, लोकमंगल और भारतीय सनातन संस्कृति के विश्वकल्याणकारी स्वरूप पर अत्यन्त आत्मीय एवं सारगर्भित संवाद हुआ। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति मूलतः समष्टि-कल्याण और लोकमंगल की संस्कृति है। हमारे ऋषियों ने कभी मनुष्य को केवल अपने लिए जीने की प्रेरणा नहीं दी। भारतीय जीवन-दृष्टि व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की ओर ले जाती है। इसी उदात्त चेतना से “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सार्वभौमिक आदर्श प्रकट हुए। वेदान्त की दृष्टि में सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही परम चेतना व्याप्त है। जब मनुष्य दूसरे के भीतर भी उसी ईश्वरीय सत्ता का अनुभव करता है तब यह अनुभूति भक्ति और आत्मीयता की सहज अभिव्यक्ति बन जाती है। पीड़ित के दुःख का निवारण, साधनहीन को अवसर, अशिक्षित को शिक्षा और रोगी को चिकित्सा प्रदान करना भी ईश्वर-आराधना का ही व्यापक स्वरूप है। "पूज्य आचार्यश्री" ने श्री अनिल अग्रवाल जी की दीर्घ पुरुषार्थ-यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि अथक परिश्रम, अदम्य संकल्प, साहस और निरन्तर कर्मशीलता के माध्यम से उन्होंने अपने औद्योगिक कार्यों को वैश्विक विस्तार दिया। वेदान्ता एवं हिन्दुस्तान जिंक सहित विविध औद्योगिक उपक्रमों के माध्यम से उनकी यात्रा भारत से विश्व के अनेक क्षेत्रों तक पहुँची है। विशेष रूप से उनके पारिवारिक संस्कारों और माता-पिता के प्रति श्रद्धा की चर्चा करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की अमूल्य निधि माना गया है। सफलता के उच्च शिखरों पर पहुँचने के बाद भी अपनी जड़ों, संस्कारों, माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ बने रहना भारतीय जीवन-मूल्यों की विशिष्टता है। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि “सम्पदा की सार्थकता केवल संग्रह में नहीं, उसके सदुपयोग में है; सामर्थ्य की श्रेष्ठता प्रभुत्व में नहीं, परोपकार में है। हमारी उपलब्धियाँ तभी पूर्णता प्राप्त करती हैं, जब उनसे किसी पीड़ित का दुःख कम हो, किसी अभावग्रस्त को अवसर मिले और समाज में आशा एवं प्रसन्नता का विस्तार हो।” श्री अनिल अग्रवाल जी के सेवा एवं परोपकार के विविध प्रयासों की चर्चा करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक उत्थान और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण की दिशा में किया गया कार्य भारतीय संस्कृति की लोकमंगलकारी चेतना का व्यावहारिक स्वरूप है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कर्म करते हुए लोकसंग्रह की भावना को महत्त्व देते हैं। जब उद्योग, उद्यमिता और आर्थिक सामर्थ्य के साथ नैतिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व जुड़ जाते हैं, तब उद्योग केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं रहता; वह राष्ट्र-निर्माण और मानव-कल्याण की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बन जाता है। संवाद के मध्य "पूज्य आचार्यश्री" ने सत्यनिष्ठा और पुरुषार्थ के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन में परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए। निरन्तर श्रम, साहस, संकल्प और सत्य के प्रति अविचल निष्ठा मनुष्य को स्थायी सफलता की ओर ले जाती है। उन्होंने श्री अनिल अग्रवाल जी के पुरुषार्थ की सराहना करते हुए कहा कि कठिनाइयों के बीच भी निरन्तर आगे बढ़ने का उनका स्वभाव, कर्म के प्रति समर्पण और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति अनुराग प्रेरणादायी है। सत्य के साथ रहना, पुरुषार्थ करते रहना और अपने सामर्थ्य को लोककल्याण से जोड़ना ही विजय का वास्तविक मंत्र है। #AvdheshanandG_Quotes #SwamiAvdheshanandGiri #AnilAgarwal #Vedanta #VasudhaivaKutumbakam #London #Mayfair #सनातन_संस्कृति
- Sep 4, 20261.6x their median
"श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव" परात्पर ब्रह्म के दिव्य प्राकट्य का महामंगल पर्व ! अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः। यर्ह्येवाजनजन्मर्क्षं शान्तर्क्षग्रहतारकम् ।। विदितोऽसि भवान् साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः। केवलानुभवानन्दस्वरूपः सर्वबुद्धिदृक् ।। द्वापर युग की उस परम मंगलमयी मध्यरात्रि में जब दिशाएँ निर्मल, नक्षत्र शान्त और सम्पूर्ण प्रकृति अलौकिक आनन्द से आप्लावित थी, तब कारागार के घोर अन्धकार में अखिल ब्रह्माण्डनायक भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य हुआ। यह किसी सामान्य जीव का जन्म नहीं, अपितु अजन्मा, अविनाशी और प्रकृति से परे परम पुरुष का स्वेच्छापूर्वक अवतरण था। जो कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठाता, सम्पूर्ण सृष्टि के आदि कारण तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं, वही परात्पर तत्त्व देवकी-वसुदेव के सम्मुख साकार सौन्दर्य बनकर प्रकट हुआ। "श्रीकृष्ण जन्माष्टमी" केवल भगवान के ऐतिहासिक आविर्भाव की स्मृति नहीं, बल्कि मानवीय अन्तःकरण में दिव्यता के पुनर्जागरण का महोत्सव है। जब मनुष्य के भीतर अज्ञान का अन्धकार विदीर्ण होता है, अहंकार की कारा टूटती है और सत्य, प्रेम, करुणा एवं आनन्द का उदय होता है, तभी उसके जीवन में श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्म होता है। इसीलिए जन्माष्टमी उपवास, पूजन और उत्सव के साथ-साथ आत्मनिरीक्षण, अन्तःशुद्धि एवं भगवदनुग्रह के प्रति कृतज्ञता का भी पावन अवसर है। भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व अनन्त आयामों से सम्पन्न है। ज्ञानियों के लिए वे निरुपाधिक, निर्विकार एवं अद्वितीय परब्रह्म हैं; भक्तों के लिए प्रेम और रस के परमाधार हैं; गोपियों के सर्वस्व, श्रीराधा के प्राण, यशोदा के लाला, ग्वालबालों के आत्मीय सखा और अर्जुन के दिव्य सारथी हैं। वही परमात्मा बदरीनारायण, जगन्नाथ, द्वारिकाधीश, श्रीनाथजी, पण्डरीनाथ विट्ठल तथा वेंकटेश श्रीनिवास जैसे असंख्य स्वरूपों में भक्तों की भावना के अनुरूप कृपा-विग्रह बनकर प्रतिष्ठित हैं। नाम, रूप और उपासना-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु उनमें अभिव्यक्त परम तत्त्व एक ही है। महर्षि वेदव्यास श्रीमद्भागवत में उद्घोषित करते हैं कि श्रीकृष्ण केवल नन्द-यशोदा के लाला अथवा किसी युगविशेष के महानायक नहीं, बल्कि प्रकृति से परे, केवल अनुभूति से ग्राह्य और आनन्दस्वरूप परम पुरुष हैं। उनकी बाललीलाओं में वात्सल्य है, रास में प्रेम का परमोत्कर्ष, गोवर्धन-धारण में शरणागत-रक्षण, कंस-वध में अधर्म का उन्मूलन और कुरुक्षेत्र में धर्म, ज्ञान एवं कर्तव्य का सार्वकालिक उद्घोष है। उनकी प्रत्येक लीला के भीतर गहन अध्यात्म, जीवनोपयोगी नीति और आत्मबोध का प्रकाश अन्तर्निहित है। भगवान के श्रीमुख से निःसृत श्रीमद्भगवद्गीता वस्तुतः समस्त उपनिषदों का सार और मानवता के लिए शाश्वत जीवन-दर्शन है। यह विषाद से प्रसाद, मोह से विवेक, दुर्बलता से पुरुषार्थ और बन्धन से मुक्ति की यात्रा है। श्रीकृष्ण मनुष्य को संसार से पलायन नहीं, अपितु समत्वबुद्धि, निष्कामता और ईश्वरार्पण भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना सिखाते हैं। वे कर्म में कौशल, ज्ञान में स्थिरता, भक्ति में अनन्यता और जीवन में लोकमंगल की प्रतिष्ठा करते हैं। श्रीकृष्ण सत्, चित् और आनन्द की अखण्ड अभिव्यक्ति हैं। वे सृष्टि में भी हैं और सृष्टि से परे भी; वे सूक्ष्मतम परमाणु में विद्यमान हैं और अनन्त ब्रह्माण्डों को अपने विराट स्वरूप में धारण किए हुए हैं। वे ही सर्वोच्च सत्ता, परम नियन्ता और सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं - फिर भी प्रेमवश भक्तों के अधीन हो जाते हैं। उनकी सर्वसमर्थता का चरम सौन्दर्य उनकी अकारण करुणा और सहज आत्मीयता में प्रकट होता है। अतः "श्रीकृष्ण जन्माष्टमी" के इस परम पावन अवसर पर हम केवल बाह्य उत्सव तक सीमित न रहें। भगवान की लीलाओं का चिन्तन करें, गीता के उपदेशों को जीवन में अनुसरण करें तथा ज्ञान की गम्भीरता को भक्ति के माधुर्य से संयुक्त करें। अपने अन्तःकरण को इतना निर्मल बनाएँ कि उसमें प्रेमस्वरूप श्रीकृष्ण का नित्य प्राकट्य हो सके। यही जन्माष्टमी की सच्ची साधना, सार्थक उपासना और मानव-जीवन की परम उपलब्धि है। समस्त विश्व को "श्रीकृष्ण जन्माष्टमी" की मंगलमयी शुभकामनाएँ। भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा से सभी के जीवन में धर्म, ज्ञान, भक्ति, प्रेम, आनन्द और परम शान्ति का प्रकाश प्रस्फुटित हो। #श्रीकृष्णजन्माष्टमी #SwamiAvdheshanandGiri #AvdheshanandG_Quotes #AvdheshanandG_Mission
- Jul 29, 20261.6x their median
गुरु केवल एक व्यक्तित्व, देह अथवा लौकिक स्वरूप नहीं, अपितु ईश्वरीय करुणा, अनन्त अनुग्रह और ब्रह्मविद्या की वह जाग्रत एवं जीवन्त सत्ता हैं, जो जीव को नश्वर जगत् की क्षणभंगुरता का बोध कराकर उसके नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं शाश्वत आत्मस्वरूप से परिचित कराती हैं। जो परिवर्तनशील जगत् के मध्य अपरिवर्तनशील सत्य का साक्षात्कार कराए, जन्म-मृत्यु के पार स्थित अमृत तत्त्व का बोध कराए तथा अन्तर्निहित दिव्यता को जागृत करे- वही सद्गुरु है। भगवत्पादाचार्य भगवान् श्री आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के अनुसार जीव के समस्त दुःखों का मूल कारण संसार नहीं, अपितु आत्मस्वरूप का अज्ञान है। अविद्या के कारण मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार तक सीमित मान लेता है। इसी से राग-द्वेष, सुख-दुःख, भय, आशा और जन्म-मृत्यु के समस्त बन्धन उत्पन्न होते हैं। सद्गुरु उसी अविद्या का निवारण कर आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट करते हैं। भगवत्पादाचार्य कहते हैं - "ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने। व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ।।" अर्थात्, ईश्वर, गुरु और आत्मा तत्त्वतः एक ही अखण्ड चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। उपाधियों के कारण भेद प्रतीत होता है, किन्तु वही परमात्मा गुरु के रूप में प्रकट होकर जीव को उसके स्वरूप का बोध कराते हैं। श्रीदक्षिणामूर्ति की मौन-परम्परा यह उद्घोष करती है कि परम सत्य तर्क का नहीं, अनुभूति का विषय है। गुरु का मौन भी उपदेश है, उनकी दृष्टि भी कृपा है, उनका जीवन भी शास्त्र है और उनका सान्निध्य भी साधना है। उनके समीप शिष्य के संशय शान्त होते हैं और आत्मतत्त्व का प्रकाश जागृत होने लगता है। इसीलिए मुण्डकोपनिषद् कहता है - “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।” अर्थात् ब्रह्मज्ञान के लिए ऐसे गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए जो शास्त्र में निष्णात तथा ब्रह्म में स्थित हों। केवल पाण्डित्य पर्याप्त नहीं, केवल अनुभूति का दावा भी नहीं; सद्गुरु वही हैं जिनके जीवन में शास्त्र और साक्षात्कार का अद्वैत समन्वय हो। वेदान्त का प्रथम उद्घोष - “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।।” साधक के जीवन में उस महान् क्षण का संकेत है जब उसकी जिज्ञासा संसार से उठकर ब्रह्म की ओर प्रवृत्त होती है। गुरु उसी जिज्ञासा को दिशा देते हैं और बताते हैं कि ब्रह्म कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, अपितु स्वयं साधक का आत्मस्वरूप है। "शास्त्रयोनित्वात्" ।। सूत्र भी यही प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान शास्त्र से होता है, और शास्त्र का यथार्थ अभिप्राय सद्गुरु के उपदेश से उद्घाटित होता है। गुरुदेव हमें कोई नवीन वस्तु नहीं देते; वे केवल अज्ञान के आवरण हटाते हैं। जैसे मेघ हटने पर सूर्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा से आत्मचैतन्य का नित्य प्रकाश प्रकट हो जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार - “तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।” सद्गुरु शास्त्रज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ और उपशमस्वरूप होते हैं। उनका उद्देश्य शिष्य को अपने व्यक्तित्व में बाँधना नहीं, बल्कि उसे आत्मस्थिति, विवेक, अभय और सर्वात्मभाव में प्रतिष्ठित करना है। श्रीदक्षिणामूर्ति-भावना में गुरु तरुण और शिष्य वृद्ध हैं। यह संकेत है कि आत्मतत्त्व नित्य नवीन है, जबकि अज्ञान अनादिकालीन है। गुरु का मौन उसी सनातन सत्य का प्रकाश है, जिसमें समस्त संशय स्वतः विलीन हो जाते हैं। श्री गुरुपूर्णिमा किसी एक महापुरुष का अभिनन्दन नहीं, बल्कि वेदव्यास से प्रवाहित अखण्ड गुरु-परम्परा के प्रति कृतज्ञता का महापर्व है। यह पावन पर्व आत्मपरीक्षण का भी अवसर है। क्या हमारे भीतर ब्रह्मजिज्ञासा जागृत हुई है? क्या हम श्रद्धा, विनय और समर्पण के साथ गुरु-उपदेश को जीवन में धारण कर रहे हैं? क्या हमारा साधनापथ हमें अज्ञान से ज्ञान, अशान्ति से शान्ति और भेद से अभेद की ओर ले जा रहा है? सद्गुरु की वास्तविक पूजा बाह्य उपचारों से नहीं, बल्कि उनके उपदेश को जीवन में उतारने, मन को निर्मल बनाने, अहंकार का परित्याग करने तथा समस्त प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व का दर्शन करने में है। आइए ! इस परम पावन श्री गुरुपूर्णिमा के अवसर पर उस करुणामयी, ज्ञानमयी, अनादि, अखण्ड ब्रह्मस्वरूप गुरुसत्ता को कोटिशः प्रणाम करें, जिनकी कृपा से आत्मस्वरूप का प्रकाश प्रकट होता है और जीव परम शान्ति, पूर्णता एवं आनन्द का साक्षात्कार करता है। परम कृपालु अनादि अखण्ड ज्ञानस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति परमेश्वर तथा गुरुसत्ता को कोटिशः नमन। "श्री गुरुपूर्णिमा" की हार्दिक शुभकामनाएँ। #श्रीगुरूपूर्णिमा_महोत्सव #स्वामी_सत्यमित्रानन्द_गिरि #प्रभु_प्रेमी_संघ #भारत_माता_मन्दिर #AvdheshanandG_Mission
- Aug 10, 20261.5x their median
लन्दन, इंग्लैंड । 09 अगस्त, 2026 इंग्लैंड की धरती पर भारतीय सनातन संस्कृति, अद्वैत वेदान्त और विश्व-बंधुत्व का शाश्वत सन्देश उस समय अत्यन्त दिव्य और प्रेरणादायी रूप में अभिव्यक्त हुआ, जब श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज "पूज्य आचार्यश्री", अध्यक्ष : हिन्दू धर्म आचार्य सभा, ने लन्दन के हैरो स्थित श्री कड़वा पाटीदार सेन्टर में आयोजित विशाल सत्संग समारोह में अपना ओजस्वी एवं आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण उद्बोधन प्रदान किया। समन्वय परिवार लन्दन द्वारा आयोजित इस भव्य सत्संग में इंग्लैंड के विभिन्न नगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधक, धर्मप्रेमी, गणमान्यजन तथा धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित हुए। सम्पूर्ण वातावरण गुरुभक्ति, श्रद्धा और भारतीय आध्यात्मिक चेतना से अनुप्राणित था। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखती है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का आधार है। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी जाति, भाषा, भूगोल अथवा बाह्य स्वरूप से नहीं, अपितु उसके भीतर विद्यमान उस एक दिव्य चेतना से है, जो सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त है। अद्वैत वेदान्त की व्याख्या करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि दृश्य और अदृश्य सम्पूर्ण जगत् उसी एक परम सत्य, उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। रूप अनेक हैं, पर सत्ता एक है; अभिव्यक्तियाँ अनेक हैं, पर चेतना एक है। यही अनुभूति मनुष्य को भेद से अभेद, संघर्ष से समन्वय, स्वार्थ से सेवा और अहंकार से करुणा की ओर ले जाती है। वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण और महाभारत के संदर्भों से "पूज्य आचार्यश्री" ने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल बाह्य उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप की खोज के लिए प्रेरित करता है। वास्तविक अध्यात्म संसार से पलायन नहीं, बल्कि अधिक संवेदनशील, करुणामय, उत्तरदायी और सेवाभावी बनने की साधना है। जब प्रत्येक प्राणी में परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं, तब सेवा कर्तव्य से आगे बढ़कर उपासना बन जाती है। इस पावन अवसर पर "पूज्य आचार्यश्री" ने अपने परम आराध्य, ब्रह्मलीन गुरुदेव भगवान् श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज का अत्यंत श्रद्धा और भावपूर्ण आत्मीयता के साथ स्मरण किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में उनके श्रीचित्र पर पुष्पहार अर्पित कर नमन किया गया। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि दशकों पूर्व, जब विदेशों में भारतीय धर्म-संस्कृति के प्रचार-प्रसार के साधन अत्यंत सीमित थे, तब पूज्य गुरुदेव ने विश्व के अनेक देशों में जाकर यज्ञ, सत्संग, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामकथा के माध्यम से सनातन धर्म की ज्योति प्रज्वलित की। आज विदेशों में बसे अनेक परिवारों में उन्हीं के द्वारा प्रदत्त संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन्त हैं। उन्होंने हरिद्वार स्थित विश्वविख्यात "भारत माता मन्दिर", "प्रभु प्रेमी संघ" तथा गुरु-परम्परा से प्रेरित सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी आध्यात्मिक संस्था की सार्थकता केवल उसके आयोजनों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह मानवता के दुःख को कितना समझती और समाज की कितनी सेवा करती है। इसी सेवा-दृष्टि को "AvdheshanandG Mission" सहित अनेक संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार, आध्यात्मिक जागरण और लोककल्याण के विविध कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ा रही हैं। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि सनातन धर्म निषेध और विभाजन का नहीं, बल्कि स्वीकार, समन्वय, सह-अस्तित्व और सम्मान का दर्शन है। आज जब विश्व संघर्ष, तनाव और विभाजन से गुजर रहा है, तब अद्वैत वेदान्त का सन्देश अत्यन्त प्रासंगिक है। इस अवसर पर भारत माता मन्दिर एवं समन्वय सेवा ट्रस्ट के महासचिव आदरणीय श्री आई.डी. शास्त्री जी भी उपस्थित रहे। आदरणीय श्री आई.डी. शास्त्री जी, आदरणीय श्री अविनाशभाई पटेल जी तथा आदरणीय श्री बकुलभाई जी ने अपने प्रेरक एवं सारगर्भित विचारों में ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृतियों, गुरु-परम्परा तथा विश्वभर में गतिमान सनातन धर्म, संस्कृति और मानव-सेवा के कार्यों का उल्लेख किया। "समन्वय परिवार लेस्टर" से प्रिय श्री जीतू भाई आचार्य सहित सभी ट्रस्टीगण, कोवेंट्री से प्रिय श्री अमित दवे जी तथा इंग्लैंड के विभिन्न नगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं साधक इस अवसर पर उपस्थित हुए। #SwamiAvdheshanandGiri #AdvaitaVedanta #SamanvayaParivar #वसुधैवकुटुम्बकम् #AvdheshanandG_Quotes
- Sep 25, 2026
"अनन्त चतुर्दशी" का पावन दिवस गणपति आराधना को एक गंभीर आध्यात्मिक प्रश्न के सम्मुख लाता है। जिन भगवान को हमने श्रद्धा से आमंत्रित किया, जिनकी प्रतिमा के समक्ष दीप जलाए, पुष्प अर्पित किए और अपने जीवन के मंगल की प्रार्थना की, आज उसी प्रतिमा का विसर्जन क्यों करते हैं ? भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आद्य शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के आलोक में देखें तब इस प्रश्न का उत्तर उत्सव की पूर्णता में निहित है। विसर्जन भक्त को आराध्य के रूप से उनके सर्वव्यापक तत्त्व का स्मरण कराता है। गणपति अथर्वशीर्ष का आरम्भ होता है “ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।” यहाँ भक्त अपने सम्मुख विराजमान गणपति का वन्दन करते हुए उनमें परम सत्य का दर्शन करता है। अथर्वशीर्ष उन्हें सच्चिदानन्द, अद्वितीय, जगत् का आधार और नित्य आत्मस्वरूप कहता है। यही गणपति आराधना का दार्शनिक विस्तार है : जिन प्रभु से भक्त प्रतिमा के समक्ष आत्मीय संवाद करता है, उन्हीं की व्यापकता को वह सम्पूर्ण जगत् में पहचानने का अभ्यास भी करता है। छान्दोग्य उपनिषद् में मिट्टी और उससे बने पात्र का दृष्टान्त आता है - “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।” भगवत्पाद भगवान् आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि पात्र का नाम और आकार बदलता है, किन्तु उसका पदार्थ मिट्टी से पृथक् नहीं हो जाता। अद्वैत में यह दृष्टान्त नाम-रूप के पीछे स्थित आधार की खोज के लिए दिया गया है। गणपति विसर्जन पर इसका स्मरण अत्यन्त सार्थक है। जिस मिट्टी ने आराधना के लिए एक सुंदर रूप धारण किया था, वह फिर जल के माध्यम से प्रकृति में लौटती है। रूप में आया परिवर्तन हमें उस सत्य पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है, जिसे किसी एक रूप के आने या जाने से सीमित नहीं किया जा सकता। यहीं विसर्जन का सही भाव समझना आवश्यक है। प्रतिमा की पूजा करते समय हमारा समर्पण वास्तविक होता है, और विदाई के समय हमारी भावुकता भी वास्तविक होती है। अद्वैत इस श्रद्धा को गहरा करता है। वह साधक से पूछता है : क्या जिन भगवान को आपने अपने घर में आदरपूर्वक स्थान दिया, उनकी करुणा को अब अपने हृदय, अपने व्यवहार और दूसरों के जीवन में भी पहचान सकोगे ? प्रतिमा के सम्मुख एकाग्र हुआ मन यदि विसर्जन के बाद भी सत्य, संयम, सेवा और करुणा में स्थिर रहे, तो उत्सव का प्रकाश जीवनभर साथ चलता है। भगवान श्रीगणपति का एकदन्त, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा से युक्त ध्यानयोग्य स्वरूप अथर्वशीर्ष में वर्णित है। उनके रूप का ध्यान मन को भक्ति में स्थिर करता है; उनके तात्त्विक स्वरूप का चिन्तन बुद्धि को व्यापक दृष्टि देता है। इस प्रकार आराधना और आत्मचिन्तन एक ही साधना के दो परस्पर पोषक आयाम बन जाते हैं। हम उनके चरणों में अपने विघ्न रखते हैं, और साथ ही यह साहस भी माँगते हैं कि अपने भीतर के अहंकार, मोह, भय और कटुता को पहचानकर उनका परित्याग कर सकें। आज जल में श्रीगणेश प्रतिमाओं का श्रद्धापूर्वक विसर्जन करते हुए हमारा अन्तःकरण यह प्रार्थना करे कि हे विघ्नविनायक ! आपकी पूजा से प्राप्त प्रसन्नता हमारे स्वभाव की सौम्यता बने; आपका स्मरण हमारे निर्णयों का विवेक बने; और आपकी अनुकम्पा सबके प्रति मंगलभाव के रूप में व्यक्त हो। हमारे द्वारा किए गए उत्सव से प्रकृति और जल की पवित्रता के प्रति आदर भी प्रकट हो, क्योंकि पृथ्वी और जल सहित पंचमहाभूतों में आपकी व्यापकता का वर्णन गणपति अथर्वशीर्ष स्वयं करता है। हे भगवान गणपति ! आप त्रैलोक्य का मंगल करें। परिवारों में स्नेह, समाज में सौहार्द, साधकों के हृदय में स्थिर श्रद्धा और समस्त प्राणियों के जीवन में शान्ति का संचार हो। जो दुःख में हैं उन्हें धैर्य मिले, जो संशय में हैं उन्हें विवेक मिले, और जो सेवा में लगे हैं उन्हें निरन्तर शक्ति मिले। यह गणपति विसर्जन समारोह सबके लिए सुखद, शुभ और कल्याणकारी हो। आज हम प्रतिमा को प्रणाम कर विदा देते हैं; साथ ही संकल्प लेते हैं कि भगवान श्रीगणपति की मंगलमयी स्मृति को अपने विचार, वाणी और कर्म में स्थान देंगे। यही विसर्जन का अद्वैतमय सन्देश है - आराधना में अनुभव किया गया पावन सान्निध्य, जगत् के प्रति हमारी दृष्टि और जीवन के प्रति हमारे उत्तरदायित्व को आलोकित करे। गणपति बप्पा मोरया ! सर्वेषां मंगलं भवतु !! #गणेश_उत्सव #अनंतचतुर्दशी #सनातन_संस्कृति #गणपतिविसर्जन #गणपति_बप्पा_मोरिया #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes
- Aug 29, 2026
"न्यू जर्सी अमेरिका USA में "पूज्य आचार्यश्री" के सान्निध्य में दिव्य रक्षा बन्धन महोत्सव एवं सत्संग !" न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), 28 अगस्त 2026 । अमेरिका के न्यू जर्सी में आज भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन-मूल्यों से परिपूर्ण वातावरण में दिव्य "रक्षाबंधन महोत्सव" मनाया गया। श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री” के पावन सान्निध्य में आयोजित इस महोत्सव में न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क तथा अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रवासी भारतीय श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ सहभागिता की। विदेश की धरती पर आयोजित यह रक्षाबन्धन महोत्सव पारिवारिक एवं सांस्कृतिक पर्व के साथ ही भारतीय अध्यात्म, पारस्परिक विश्वास, संरक्षण, करुणा और विश्वबंधुत्व का प्रेरणादायी उत्सव बन गया। सम्पूर्ण आयोजन स्थल भारतीय संस्कृति की दिव्य सुगन्ध और गुरु-सान्निध्य की अलौकिक अनुभूति से आप्लावित रहा। महोत्सव के अंतर्गत दो विशिष्ट सत्संग संगोष्ठियाँ आयोजित हुईं। प्रथम सत्र में परम आदरणीया पूज्या शैला माता जी तथा "पूज्य आचार्यश्री" ने अपने सारगर्भित एवं आध्यात्मिक उद्बोधनों से श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। पूज्या शैला माता जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय ‘भक्तियोग’ पर प्रभावशाली प्रवचन दिया। उन्होंने भक्ति की निर्मलता, ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण तथा साधक के जीवन में श्रद्धा, प्रेम और विनम्रता की महत्ता को हृदयस्पर्शी शब्दों में अभिव्यक्त किया। तदनन्तर, "पूज्य आचार्यश्री" ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय की विशद व्याख्या करते हुए कहा कि इस अध्याय के तेरहवें से बीसवें श्लोक तक वर्णित भगवान् के प्रिय भक्त के दिव्य लक्षणों को ‘अमृताष्टक’ कहा जाता है। इन आठ श्लोकों में ऐसे भक्त का स्वरूप प्रतिपादित है, जो समस्त प्राणियों के प्रति द्वेषरहित, मैत्रीपूर्ण, करुणामय, अहंकार एवं ममता से मुक्त, सुख-दुःख में समभाव रखने वाला, क्षमाशील, संतुष्ट, आत्मसंयमी और परमात्मा में दृढ़ निष्ठा रखने वाला होता है। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य के भीतर विद्यमान दिव्यता, श्रेष्ठता, आध्यात्मिक सामर्थ्य और अक्षय ऊर्जा को उद्घाटित करती है। गीता केवल एक धर्मग्रन्थ नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उचित दिशा प्रदान करने वाला सार्वकालिक जीवन-दर्शन है। वह मनुष्य को विषाद से प्रसाद, भ्रम से बोध, दुर्बलता से आत्मबल और बन्धन से परम मुक्ति की ओर ले जाती है। जीवन के परम लक्ष्य की सिद्धि, अन्तःकरण की शुद्धि और व्यक्तित्व के सर्वांगीण उत्कर्ष के लिए गीता का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति केवल कर्मकाण्ड अथवा भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का रूपान्तरण है। जिसके व्यवहार में करुणा, सहिष्णुता, समता, क्षमा, विनम्रता और लोकमंगल की भावना प्रकट होने लगे, वही वास्तविक अर्थ में भगवद्भक्त है। भक्तियोग मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने के साथ समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम और सद्भाव से भी परिपूर्ण करता है। सत्संग के उपरान्त रक्षाबंधन का अत्यन्त भावपूर्ण अनुष्ठान सम्पन्न हुआ। सर्वप्रथम आदरणीया पूज्या शैला माता जी ने "पूज्य आचार्यश्री" की कलाई पर पवित्र राखी बाँधकर अपनी श्रद्धा और आत्मीयता अभिव्यक्त की। इसके पश्चात् उपस्थित माताओं एवं बहनों ने "पूज्य आचार्यश्री" को रक्षासूत्र अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। "पूज्य आचार्यश्री" ने भी श्रद्धालुओं की कलाइयों पर पवित्र रक्षासूत्र बाँधकर उनके स्वस्थ, समृद्ध और मंगलमय जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में निहित प्रेम, पवित्रता, विश्वास और उत्तरदायित्व का महान पर्व है। रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, अपितु धर्म, संस्कृति, सदाचार, मानवीय गरिमा और पारिवारिक आत्मीयता की रक्षा का पवित्र संकल्प है। यह पर्व स्मरण कराता है कि हम एक-दूसरे के सुख, सम्मान, सुरक्षा और कल्याण के प्रति उत्तरदायी हैं। रक्षा का वास्तविक अर्थ व्यक्ति को भय, निराशा, असंयम एवं अधर्म से बचाकर सत्य, सदाचार और आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रतिष्ठित करना भी है। सायंकालीन सत्संग संगोष्ठी में "पूज्य आचार्यश्री' ने सनातन धर्म के व्यापक और सर्वसमावेशी स्वरूप की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति संयम, अनुशासन, सदाचार, सेवा, सह-अस्तित्व और आत्मीयता की संस्कृति है। यह मनुष्य को अधिकारों से पहले कर्तव्यों, उपभोग से पहले त्याग और व्यक्तिगत सुख से ऊपर समष्टि के कल्याण की प्रेरणा देती है। #AvdheshanandG_Quotes #USA #NewYork #रक्षाबन्धन
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A typical post picks up 417 interactions against 322K followers, an engagement rate of 0.13%. Measured over 48 original posts, its engagement rate beats 75% of 21,185 tracked accounts of a similar size, which puts it in the middle of its size range rather than at either end. Posts are seen about 4.8K times each, and 8.61% of those impressions turn into an interaction. That is about 1.50% of the follower count, which is the gap between an audience on paper and an audience in a timeline. Posting runs at about 1.6 posts a day over the last 30 days, with activity on almost every day in the window. Most posts go out around 01:00 UTC, and Wednesday is the busiest day of the week. Of the 48 posts sampled, 100% carry an image or video. The account's strongest tracked post pulled 3.1K interactions, about 7.5x its own typical post.
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- Swami Avdheshanand (@AvdheshanandG) has an engagement rate of 0.13%, based on the median interactions across 48 original posts from the last 30 days against 322,012 followers. Replies, reposts and quote-posts of other people are excluded from that sample.
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