Swami Avdheshanand engagement report
@AvdheshanandG - 324K followers on X
Measured over 44 original posts from a 30-day window, last computed on September 4, 2026.
Engagement
A typical post picks up 435 interactions against 324K followers, an engagement rate of 0.134%. Measured over 44 original posts, its engagement rate beats 70% of 6,874 tracked accounts of a similar size, which puts it in the middle of its size range rather than at either end. Posts are seen about 6.5K times each, and 6.65% of those impressions turn into an interaction. That is about 2.02% of the follower count, which is the gap between an audience on paper and an audience in a timeline. Posting runs at about 1.5 posts a day over the last 30 days, with activity on almost every day in the window. Most posts go out around 01:00 UTC, and Thursday is the busiest day of the week. Of the 44 posts sampled, 100% carry an image or video. The account's strongest tracked post pulled 3.1K interactions, about 7.1x its own typical post.
Measured over 44 original posts from a 30-day window, last computed on September 4, 2026.
Compared with accounts its own size
Swami Avdheshanand's engagement rate beats 70% of the tracked X accounts closest to it in follower count (6,874 accounts, accounts of similar size (decile 8 of 10)). A percentile is spread evenly by construction, so 50 really is the middle of that group and 90 really is its top tenth.
On engagement per impression rather than per follower it beats 94% of the same group. When those two numbers disagree, the gap is about how far its posts travel rather than how people react to them.
Where this sits in the catalog
At 0.134%, Swami Avdheshanand sits above the 50th percentile of the 66,258 accounts in this comparison. That places it in the above the median band, which runs 0.1% to 0.499%.
Show the percentile table
| Percentile | Engagement rate |
|---|---|
| 10th percentile | 0.002% |
| 25th percentile | 0.016% |
| 50th percentile | 0.1% |
| 75th percentile | 0.499% |
| 90th percentile | 2.09% |
| 99th percentile | 119.6% |
This ruler is the whole measured catalog, not a size-matched group: it shows where the raw rate falls across every account we can measure, all of which are large. For a like-for-like comparison, read the size-band percentile above instead. See how the bands are built
Posting timing
This account posts most often around 01:00 UTC, and Thursday is its busiest day of the week. The bars below are the catalog-wide pattern, with this account's own busiest slot marked. They do not show how this account performs at each hour: we keep one aggregate per account, not one per hour, so that measurement does not exist in our data.
Show engagement by hour posted, utc as a table
| Hour (UTC) | Vs author median | Posts |
|---|---|---|
| 00:00 UTC | -1% | 89K |
| 01:00 UTC | -2% | 90K |
| 02:00 UTC | -3% | 88K |
| 03:00 UTC | -4% | 94K |
| 04:00 UTC | -5% | 76K |
| 05:00 UTC | -4% | 75K |
| 06:00 UTC | -5% | 86K |
| 07:00 UTC | -5% | 93K |
| 08:00 UTC | -4% | 108K |
| 09:00 UTC | -4% | 124K |
| 10:00 UTC | -3% | 129K |
| 11:00 UTC | -3% | 141K |
| 12:00 UTC | -3% | 154K |
| 13:00 UTC | -3% | 167K |
| 14:00 UTC | -4% | 173K |
| 15:00 UTC | -2% | 176K |
| 16:00 UTC | -3% | 171K |
| 17:00 UTC | -3% | 159K |
| 18:00 UTC | -2% | 149K |
| 19:00 UTC | -2% | 141K |
| 20:00 UTC | -1% | 131K |
| 21:00 UTC | 0% | 116K |
| 22:00 UTC | -2% | 100K |
| 23:00 UTC | -1% | 90K |
Show engagement by day of week as a table
| Day | Vs author median | Posts |
|---|---|---|
| Sunday | +5% | 393K |
| Monday | +1% | 483K |
| Tuesday | -2% | 520K |
| Wednesday | -3% | 472K |
| Thursday | -2% | 430K |
| Friday | -3% | 447K |
| Saturday | +2% | 393K |
Formats this account uses
Its own posting mix on the left, and what each of those formats does across every account we track on the right. Only formats where the effect clears our publish test appear here, so an empty row is a format we could not measure rather than one that does nothing.
| Format | This account | Catalog effect | 95% interval | Accounts behind it |
|---|---|---|---|---|
| Image or video | 100% of posts | +111% | +108% to +115% | 34K |
| Outbound link | 0% of posts | -41% | -42% to -40% | 32K |
| Typical length | - | +15% | +14% to +16% | 32K |
- 100% of this account's sampled posts carry an image or video. Across the catalog, posts with an image or video run 111% above the same accounts' other posts.
- 0% of its posts carry a link off X. Across the catalog, posts with an outbound link run 41% below the same accounts' other posts.
- Its average post runs 3571 characters, which falls in the over 280 characters band. Across the catalog, posts over 280 characters run 15% above the same accounts' other posts.
These are catalog-wide differences applied to this account's own posting mix, not a measurement of how each format performs for this account specifically. We keep one median per account, not one per format per account, so the second thing is not something this data can tell you.
Best tweets
- Aug 1, 20267.1x their median
मर्यादित भाषा ही भारत की आत्मा है ! भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, अपितु एक सनातन सांस्कृतिक चेतना है। यह वह पुण्यभूमि है जहाँ मानव-जीवन को केवल अधिकारों के आधार पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों, मर्यादाओं, सदाचार और पारस्परिक सम्मान के आधार पर परिभाषित किया गया है। हमारी सनातन संस्कृति का मूल स्वर यही है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दिव्यता का वास है, अतः प्रत्येक के प्रति आदर, विनम्रता और शिष्टाचार का व्यवहार होना चाहिए। वेदों ने हमें सिखाया कि “संगच्छध्वं संवदध्वं” साथ चलो, साथ विचार करो और संवाद के माध्यम से समाज का निर्माण करो। भारतीय परम्परा में मतभेद स्वीकार्य हैं, किन्तु मनभेद नहीं; विचारों का प्रतिवाद स्वीकार्य है, किन्तु व्यक्तियों का अपमान कभी स्वीकार्य नहीं रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति व्यक्त करने, प्रदर्शन करने तथा शासन की नीतियों की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है। यही लोकतंत्र की शक्ति और उसकी गरिमा है। किन्तु जब विरोध की अभिव्यक्ति मर्यादा की सीमा का अतिक्रमण कर अशोभनीय, अपमानजनक अथवा अमर्यादित भाषा का रूप धारण कर लेती है, तब वह केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का भी अवमूल्यन करती है। हाल के दिनों में सार्वजनिक मंचों पर माननीय प्रधानमंत्री के प्रति जिस प्रकार की अभद्र, अशिष्ट और अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया; विशेषतः उनकी स्वर्गीया पूज्या माताजी के प्रति जिस प्रकार के असम्मानजनक शब्द कहे गए, वे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सनातन जीवन-दृष्टि के सर्वथा प्रतिकूल हैं। किसी भी मतभेद, वैचारिक संघर्ष अथवा राजनीतिक असहमति का समाधान कभी भी अपशब्दों से नहीं हो सकता। ऐसी भाषा न लोकतंत्र की मर्यादा है और न ही भारत की आत्मा। हमारी संस्कृति तो यह सिखाती है कि विरोधी के प्रति भी संयम, शिष्टाचार और गरिमा बनी रहे। रामायण में युद्धभूमि के मध्य भी मर्यादा का पालन है; महाभारत में भीषण संघर्ष के बीच भी संवाद और सम्मान की अनेक परम्पराएँ दिखाई देती हैं; श्रीमद्भागवत करुणा, क्षमा और सद्भाव का संदेश देती है। भारतीय परम्परा में तो शत्रु के प्रति भी अपमानजनक भाषा का समर्थन नहीं किया गया। संपूर्ण संत समाज और आध्यात्मिक जगत ऐसे अमर्यादित शब्दों से अत्यंत आहत है। हमारी स्पष्ट मान्यता है कि सार्वजनिक जीवन में आसीन किसी भी व्यक्ति के साथ असहमति हो सकती है, किन्तु उसके प्रति अशिष्ट, अपमानजनक और निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक पदों की गरिमा का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है। पद का सम्मान किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सम्मान है। भारतीय संस्कृति का वैश्विक परिचय ही हमारी विनम्रता, शालीनता और उदात्त दृष्टि है। संसार हमें ऋषि-मुनियों की संतति के रूप में जानता है। हम वह सभ्यता हैं जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उद्घोष करती है; जो प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन करती है; जो वृक्ष, वनस्पति, पशु-पक्षी और समस्त सृष्टि के प्रति भी करुणा एवं सम्मान का भाव रखती है। जब हमारी संस्कृति इतनी व्यापक और उदात्त है, तब हमारी भाषा भी उसी गरिमा का प्रतिबिंब होनी चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि विशेषकर युवा पीढ़ी यह समझे कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार का दर्पण है।जिस समाज की भाषा मर्यादित होती है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल होता है।कटुता, अपमान और अशिष्टता कभी भी स्थायी समाधान नहीं देती; संवाद, विवेक और शालीनता ही राष्ट्र को आगे ले जाते हैं। देश के विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आदरणीय प्रधानमन्त्री जी की संवेदनशीलता सजगता स्तुत्य है। उनके द्वारा शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी, गुणवत्तापूर्ण तथा विद्यार्थी-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से अनेक सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं, ताकि शिक्षा व्यवस्था अधिक सुदृढ़ हो, विद्यार्थियों के हितों की बेहतर रक्षा हो तथा उनके भविष्य के साथ किसी प्रकार का अन्याय न होने पाए। किसी भी नीति या व्यवस्था का उद्देश्य यही होना चाहिए कि विद्यार्थियों को निष्पक्ष, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक वातावरण प्राप्त हो तथा उनके जीवन-निर्माण की प्रक्रिया अधिक सशक्त बने। हम उन सभी व्यक्तियों के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हैं जिन्होंने द्वेषपूर्वक आहत करने वाली अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि-सद्विचार-सद्विवेक प्रदान करें ताकि वे भारत की महान सांस्कृतिक परम्पराओं, मान-मर्यादाओं, नैतिक मूल्यों व लोकतांत्रिक आदर्शों का सम्मान करते हुए राष्ट्र-निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा सकें। @narendramodi @PMOIndia
- Aug 9, 20262.2x their median
लंदन, इंग्लैंड। सुप्रसिद्ध उद्योगपति एवं "वेदान्ता समूह" के संस्थापक-चेयरमैन आदरणीय श्री अनिल अग्रवाल जी के स्नेहिल आमंत्रण पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद गुरूदेव श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “आचार्यश्रीजी” 08 अगस्त, 2026 की सायंकाल उनके मेफेयर, लंदन स्थित निवास पर पधारे। इस आत्मीय भेंट के प्रारम्भ में "पूज्य आचार्यश्री" ने श्री अनिल अग्रवाल जी के दिवंगत पुत्र की पुण्यस्मृति में भावपूर्ण प्रार्थना की तथा परमात्मा से दिवंगत आत्मा की शान्ति और परिवार को आत्मबल प्रदान करने की मंगलकामना की। इसके पश्चात श्री अनिल अग्रवाल जी एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती किरण अग्रवाल जी के साथ "पूज्य आचार्यश्री" का अध्यात्म, उद्योग, पुरुषार्थ, सेवा, परोपकार, लोकमंगल और भारतीय सनातन संस्कृति के विश्वकल्याणकारी स्वरूप पर अत्यन्त आत्मीय एवं सारगर्भित संवाद हुआ। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति मूलतः समष्टि-कल्याण और लोकमंगल की संस्कृति है। हमारे ऋषियों ने कभी मनुष्य को केवल अपने लिए जीने की प्रेरणा नहीं दी। भारतीय जीवन-दृष्टि व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की ओर ले जाती है। इसी उदात्त चेतना से “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सार्वभौमिक आदर्श प्रकट हुए। वेदान्त की दृष्टि में सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही परम चेतना व्याप्त है। जब मनुष्य दूसरे के भीतर भी उसी ईश्वरीय सत्ता का अनुभव करता है तब यह अनुभूति भक्ति और आत्मीयता की सहज अभिव्यक्ति बन जाती है। पीड़ित के दुःख का निवारण, साधनहीन को अवसर, अशिक्षित को शिक्षा और रोगी को चिकित्सा प्रदान करना भी ईश्वर-आराधना का ही व्यापक स्वरूप है। "पूज्य आचार्यश्री" ने श्री अनिल अग्रवाल जी की दीर्घ पुरुषार्थ-यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि अथक परिश्रम, अदम्य संकल्प, साहस और निरन्तर कर्मशीलता के माध्यम से उन्होंने अपने औद्योगिक कार्यों को वैश्विक विस्तार दिया। वेदान्ता एवं हिन्दुस्तान जिंक सहित विविध औद्योगिक उपक्रमों के माध्यम से उनकी यात्रा भारत से विश्व के अनेक क्षेत्रों तक पहुँची है। विशेष रूप से उनके पारिवारिक संस्कारों और माता-पिता के प्रति श्रद्धा की चर्चा करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की अमूल्य निधि माना गया है। सफलता के उच्च शिखरों पर पहुँचने के बाद भी अपनी जड़ों, संस्कारों, माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ बने रहना भारतीय जीवन-मूल्यों की विशिष्टता है। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि “सम्पदा की सार्थकता केवल संग्रह में नहीं, उसके सदुपयोग में है; सामर्थ्य की श्रेष्ठता प्रभुत्व में नहीं, परोपकार में है। हमारी उपलब्धियाँ तभी पूर्णता प्राप्त करती हैं, जब उनसे किसी पीड़ित का दुःख कम हो, किसी अभावग्रस्त को अवसर मिले और समाज में आशा एवं प्रसन्नता का विस्तार हो।” श्री अनिल अग्रवाल जी के सेवा एवं परोपकार के विविध प्रयासों की चर्चा करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक उत्थान और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण की दिशा में किया गया कार्य भारतीय संस्कृति की लोकमंगलकारी चेतना का व्यावहारिक स्वरूप है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कर्म करते हुए लोकसंग्रह की भावना को महत्त्व देते हैं। जब उद्योग, उद्यमिता और आर्थिक सामर्थ्य के साथ नैतिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व जुड़ जाते हैं, तब उद्योग केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं रहता; वह राष्ट्र-निर्माण और मानव-कल्याण की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बन जाता है। संवाद के मध्य "पूज्य आचार्यश्री" ने सत्यनिष्ठा और पुरुषार्थ के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जीवन में परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए। निरन्तर श्रम, साहस, संकल्प और सत्य के प्रति अविचल निष्ठा मनुष्य को स्थायी सफलता की ओर ले जाती है। उन्होंने श्री अनिल अग्रवाल जी के पुरुषार्थ की सराहना करते हुए कहा कि कठिनाइयों के बीच भी निरन्तर आगे बढ़ने का उनका स्वभाव, कर्म के प्रति समर्पण और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति अनुराग प्रेरणादायी है। सत्य के साथ रहना, पुरुषार्थ करते रहना और अपने सामर्थ्य को लोककल्याण से जोड़ना ही विजय का वास्तविक मंत्र है। #AvdheshanandG_Quotes #SwamiAvdheshanandGiri #AnilAgarwal #Vedanta #VasudhaivaKutumbakam #London #Mayfair #सनातन_संस्कृति
- Jul 29, 20261.5x their median
गुरु केवल एक व्यक्तित्व, देह अथवा लौकिक स्वरूप नहीं, अपितु ईश्वरीय करुणा, अनन्त अनुग्रह और ब्रह्मविद्या की वह जाग्रत एवं जीवन्त सत्ता हैं, जो जीव को नश्वर जगत् की क्षणभंगुरता का बोध कराकर उसके नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त एवं शाश्वत आत्मस्वरूप से परिचित कराती हैं। जो परिवर्तनशील जगत् के मध्य अपरिवर्तनशील सत्य का साक्षात्कार कराए, जन्म-मृत्यु के पार स्थित अमृत तत्त्व का बोध कराए तथा अन्तर्निहित दिव्यता को जागृत करे- वही सद्गुरु है। भगवत्पादाचार्य भगवान् श्री आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के अनुसार जीव के समस्त दुःखों का मूल कारण संसार नहीं, अपितु आत्मस्वरूप का अज्ञान है। अविद्या के कारण मनुष्य स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार तक सीमित मान लेता है। इसी से राग-द्वेष, सुख-दुःख, भय, आशा और जन्म-मृत्यु के समस्त बन्धन उत्पन्न होते हैं। सद्गुरु उसी अविद्या का निवारण कर आत्मज्ञान का प्रकाश प्रकट करते हैं। भगवत्पादाचार्य कहते हैं - "ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने। व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ।।" अर्थात्, ईश्वर, गुरु और आत्मा तत्त्वतः एक ही अखण्ड चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ हैं। उपाधियों के कारण भेद प्रतीत होता है, किन्तु वही परमात्मा गुरु के रूप में प्रकट होकर जीव को उसके स्वरूप का बोध कराते हैं। श्रीदक्षिणामूर्ति की मौन-परम्परा यह उद्घोष करती है कि परम सत्य तर्क का नहीं, अनुभूति का विषय है। गुरु का मौन भी उपदेश है, उनकी दृष्टि भी कृपा है, उनका जीवन भी शास्त्र है और उनका सान्निध्य भी साधना है। उनके समीप शिष्य के संशय शान्त होते हैं और आत्मतत्त्व का प्रकाश जागृत होने लगता है। इसीलिए मुण्डकोपनिषद् कहता है - “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ।।” अर्थात् ब्रह्मज्ञान के लिए ऐसे गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए जो शास्त्र में निष्णात तथा ब्रह्म में स्थित हों। केवल पाण्डित्य पर्याप्त नहीं, केवल अनुभूति का दावा भी नहीं; सद्गुरु वही हैं जिनके जीवन में शास्त्र और साक्षात्कार का अद्वैत समन्वय हो। वेदान्त का प्रथम उद्घोष - “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।।” साधक के जीवन में उस महान् क्षण का संकेत है जब उसकी जिज्ञासा संसार से उठकर ब्रह्म की ओर प्रवृत्त होती है। गुरु उसी जिज्ञासा को दिशा देते हैं और बताते हैं कि ब्रह्म कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, अपितु स्वयं साधक का आत्मस्वरूप है। "शास्त्रयोनित्वात्" ।। सूत्र भी यही प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म का यथार्थ ज्ञान शास्त्र से होता है, और शास्त्र का यथार्थ अभिप्राय सद्गुरु के उपदेश से उद्घाटित होता है। गुरुदेव हमें कोई नवीन वस्तु नहीं देते; वे केवल अज्ञान के आवरण हटाते हैं। जैसे मेघ हटने पर सूर्य स्वयं प्रकाशित हो जाता है, वैसे ही गुरु की कृपा से आत्मचैतन्य का नित्य प्रकाश प्रकट हो जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार - “तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्। शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम् ।।” सद्गुरु शास्त्रज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ और उपशमस्वरूप होते हैं। उनका उद्देश्य शिष्य को अपने व्यक्तित्व में बाँधना नहीं, बल्कि उसे आत्मस्थिति, विवेक, अभय और सर्वात्मभाव में प्रतिष्ठित करना है। श्रीदक्षिणामूर्ति-भावना में गुरु तरुण और शिष्य वृद्ध हैं। यह संकेत है कि आत्मतत्त्व नित्य नवीन है, जबकि अज्ञान अनादिकालीन है। गुरु का मौन उसी सनातन सत्य का प्रकाश है, जिसमें समस्त संशय स्वतः विलीन हो जाते हैं। श्री गुरुपूर्णिमा किसी एक महापुरुष का अभिनन्दन नहीं, बल्कि वेदव्यास से प्रवाहित अखण्ड गुरु-परम्परा के प्रति कृतज्ञता का महापर्व है। यह पावन पर्व आत्मपरीक्षण का भी अवसर है। क्या हमारे भीतर ब्रह्मजिज्ञासा जागृत हुई है? क्या हम श्रद्धा, विनय और समर्पण के साथ गुरु-उपदेश को जीवन में धारण कर रहे हैं? क्या हमारा साधनापथ हमें अज्ञान से ज्ञान, अशान्ति से शान्ति और भेद से अभेद की ओर ले जा रहा है? सद्गुरु की वास्तविक पूजा बाह्य उपचारों से नहीं, बल्कि उनके उपदेश को जीवन में उतारने, मन को निर्मल बनाने, अहंकार का परित्याग करने तथा समस्त प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व का दर्शन करने में है। आइए ! इस परम पावन श्री गुरुपूर्णिमा के अवसर पर उस करुणामयी, ज्ञानमयी, अनादि, अखण्ड ब्रह्मस्वरूप गुरुसत्ता को कोटिशः प्रणाम करें, जिनकी कृपा से आत्मस्वरूप का प्रकाश प्रकट होता है और जीव परम शान्ति, पूर्णता एवं आनन्द का साक्षात्कार करता है। परम कृपालु अनादि अखण्ड ज्ञानस्वरूप श्रीदक्षिणामूर्ति परमेश्वर तथा गुरुसत्ता को कोटिशः नमन। "श्री गुरुपूर्णिमा" की हार्दिक शुभकामनाएँ। #श्रीगुरूपूर्णिमा_महोत्सव #स्वामी_सत्यमित्रानन्द_गिरि #प्रभु_प्रेमी_संघ #भारत_माता_मन्दिर #AvdheshanandG_Mission
- Aug 10, 2026
लन्दन, इंग्लैंड । 09 अगस्त, 2026 इंग्लैंड की धरती पर भारतीय सनातन संस्कृति, अद्वैत वेदान्त और विश्व-बंधुत्व का शाश्वत सन्देश उस समय अत्यन्त दिव्य और प्रेरणादायी रूप में अभिव्यक्त हुआ, जब श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज "पूज्य आचार्यश्री", अध्यक्ष : हिन्दू धर्म आचार्य सभा, ने लन्दन के हैरो स्थित श्री कड़वा पाटीदार सेन्टर में आयोजित विशाल सत्संग समारोह में अपना ओजस्वी एवं आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण उद्बोधन प्रदान किया। समन्वय परिवार लन्दन द्वारा आयोजित इस भव्य सत्संग में इंग्लैंड के विभिन्न नगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधक, धर्मप्रेमी, गणमान्यजन तथा धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित हुए। सम्पूर्ण वातावरण गुरुभक्ति, श्रद्धा और भारतीय आध्यात्मिक चेतना से अनुप्राणित था। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखती है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दृष्टि का आधार है। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी जाति, भाषा, भूगोल अथवा बाह्य स्वरूप से नहीं, अपितु उसके भीतर विद्यमान उस एक दिव्य चेतना से है, जो सम्पूर्ण चराचर में व्याप्त है। अद्वैत वेदान्त की व्याख्या करते हुए "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि दृश्य और अदृश्य सम्पूर्ण जगत् उसी एक परम सत्य, उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। रूप अनेक हैं, पर सत्ता एक है; अभिव्यक्तियाँ अनेक हैं, पर चेतना एक है। यही अनुभूति मनुष्य को भेद से अभेद, संघर्ष से समन्वय, स्वार्थ से सेवा और अहंकार से करुणा की ओर ले जाती है। वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण और महाभारत के संदर्भों से "पूज्य आचार्यश्री" ने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल बाह्य उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे अपने वास्तविक स्वरूप की खोज के लिए प्रेरित करता है। वास्तविक अध्यात्म संसार से पलायन नहीं, बल्कि अधिक संवेदनशील, करुणामय, उत्तरदायी और सेवाभावी बनने की साधना है। जब प्रत्येक प्राणी में परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं, तब सेवा कर्तव्य से आगे बढ़कर उपासना बन जाती है। इस पावन अवसर पर "पूज्य आचार्यश्री" ने अपने परम आराध्य, ब्रह्मलीन गुरुदेव भगवान् श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज का अत्यंत श्रद्धा और भावपूर्ण आत्मीयता के साथ स्मरण किया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में उनके श्रीचित्र पर पुष्पहार अर्पित कर नमन किया गया। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि दशकों पूर्व, जब विदेशों में भारतीय धर्म-संस्कृति के प्रचार-प्रसार के साधन अत्यंत सीमित थे, तब पूज्य गुरुदेव ने विश्व के अनेक देशों में जाकर यज्ञ, सत्संग, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामकथा के माध्यम से सनातन धर्म की ज्योति प्रज्वलित की। आज विदेशों में बसे अनेक परिवारों में उन्हीं के द्वारा प्रदत्त संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन्त हैं। उन्होंने हरिद्वार स्थित विश्वविख्यात "भारत माता मन्दिर", "प्रभु प्रेमी संघ" तथा गुरु-परम्परा से प्रेरित सेवा कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी आध्यात्मिक संस्था की सार्थकता केवल उसके आयोजनों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह मानवता के दुःख को कितना समझती और समाज की कितनी सेवा करती है। इसी सेवा-दृष्टि को "AvdheshanandG Mission" सहित अनेक संस्थाएँ शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार, आध्यात्मिक जागरण और लोककल्याण के विविध कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ा रही हैं। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि सनातन धर्म निषेध और विभाजन का नहीं, बल्कि स्वीकार, समन्वय, सह-अस्तित्व और सम्मान का दर्शन है। आज जब विश्व संघर्ष, तनाव और विभाजन से गुजर रहा है, तब अद्वैत वेदान्त का सन्देश अत्यन्त प्रासंगिक है। इस अवसर पर भारत माता मन्दिर एवं समन्वय सेवा ट्रस्ट के महासचिव आदरणीय श्री आई.डी. शास्त्री जी भी उपस्थित रहे। आदरणीय श्री आई.डी. शास्त्री जी, आदरणीय श्री अविनाशभाई पटेल जी तथा आदरणीय श्री बकुलभाई जी ने अपने प्रेरक एवं सारगर्भित विचारों में ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृतियों, गुरु-परम्परा तथा विश्वभर में गतिमान सनातन धर्म, संस्कृति और मानव-सेवा के कार्यों का उल्लेख किया। "समन्वय परिवार लेस्टर" से प्रिय श्री जीतू भाई आचार्य सहित सभी ट्रस्टीगण, कोवेंट्री से प्रिय श्री अमित दवे जी तथा इंग्लैंड के विभिन्न नगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं साधक इस अवसर पर उपस्थित हुए। #SwamiAvdheshanandGiri #AdvaitaVedanta #SamanvayaParivar #वसुधैवकुटुम्बकम् #AvdheshanandG_Quotes
- Aug 29, 2026
"न्यू जर्सी अमेरिका USA में "पूज्य आचार्यश्री" के सान्निध्य में दिव्य रक्षा बन्धन महोत्सव एवं सत्संग !" न्यू जर्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), 28 अगस्त 2026 । अमेरिका के न्यू जर्सी में आज भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन-मूल्यों से परिपूर्ण वातावरण में दिव्य "रक्षाबंधन महोत्सव" मनाया गया। श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री” के पावन सान्निध्य में आयोजित इस महोत्सव में न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क तथा अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रवासी भारतीय श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ सहभागिता की। विदेश की धरती पर आयोजित यह रक्षाबन्धन महोत्सव पारिवारिक एवं सांस्कृतिक पर्व के साथ ही भारतीय अध्यात्म, पारस्परिक विश्वास, संरक्षण, करुणा और विश्वबंधुत्व का प्रेरणादायी उत्सव बन गया। सम्पूर्ण आयोजन स्थल भारतीय संस्कृति की दिव्य सुगन्ध और गुरु-सान्निध्य की अलौकिक अनुभूति से आप्लावित रहा। महोत्सव के अंतर्गत दो विशिष्ट सत्संग संगोष्ठियाँ आयोजित हुईं। प्रथम सत्र में परम आदरणीया पूज्या शैला माता जी तथा "पूज्य आचार्यश्री" ने अपने सारगर्भित एवं आध्यात्मिक उद्बोधनों से श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया। पूज्या शैला माता जी ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय ‘भक्तियोग’ पर प्रभावशाली प्रवचन दिया। उन्होंने भक्ति की निर्मलता, ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण तथा साधक के जीवन में श्रद्धा, प्रेम और विनम्रता की महत्ता को हृदयस्पर्शी शब्दों में अभिव्यक्त किया। तदनन्तर, "पूज्य आचार्यश्री" ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय की विशद व्याख्या करते हुए कहा कि इस अध्याय के तेरहवें से बीसवें श्लोक तक वर्णित भगवान् के प्रिय भक्त के दिव्य लक्षणों को ‘अमृताष्टक’ कहा जाता है। इन आठ श्लोकों में ऐसे भक्त का स्वरूप प्रतिपादित है, जो समस्त प्राणियों के प्रति द्वेषरहित, मैत्रीपूर्ण, करुणामय, अहंकार एवं ममता से मुक्त, सुख-दुःख में समभाव रखने वाला, क्षमाशील, संतुष्ट, आत्मसंयमी और परमात्मा में दृढ़ निष्ठा रखने वाला होता है। "पूज्य आचार्यश्री" ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य के भीतर विद्यमान दिव्यता, श्रेष्ठता, आध्यात्मिक सामर्थ्य और अक्षय ऊर्जा को उद्घाटित करती है। गीता केवल एक धर्मग्रन्थ नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उचित दिशा प्रदान करने वाला सार्वकालिक जीवन-दर्शन है। वह मनुष्य को विषाद से प्रसाद, भ्रम से बोध, दुर्बलता से आत्मबल और बन्धन से परम मुक्ति की ओर ले जाती है। जीवन के परम लक्ष्य की सिद्धि, अन्तःकरण की शुद्धि और व्यक्तित्व के सर्वांगीण उत्कर्ष के लिए गीता का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति केवल कर्मकाण्ड अथवा भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का रूपान्तरण है। जिसके व्यवहार में करुणा, सहिष्णुता, समता, क्षमा, विनम्रता और लोकमंगल की भावना प्रकट होने लगे, वही वास्तविक अर्थ में भगवद्भक्त है। भक्तियोग मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने के साथ समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम और सद्भाव से भी परिपूर्ण करता है। सत्संग के उपरान्त रक्षाबंधन का अत्यन्त भावपूर्ण अनुष्ठान सम्पन्न हुआ। सर्वप्रथम आदरणीया पूज्या शैला माता जी ने "पूज्य आचार्यश्री" की कलाई पर पवित्र राखी बाँधकर अपनी श्रद्धा और आत्मीयता अभिव्यक्त की। इसके पश्चात् उपस्थित माताओं एवं बहनों ने "पूज्य आचार्यश्री" को रक्षासूत्र अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। "पूज्य आचार्यश्री" ने भी श्रद्धालुओं की कलाइयों पर पवित्र रक्षासूत्र बाँधकर उनके स्वस्थ, समृद्ध और मंगलमय जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में निहित प्रेम, पवित्रता, विश्वास और उत्तरदायित्व का महान पर्व है। रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, अपितु धर्म, संस्कृति, सदाचार, मानवीय गरिमा और पारिवारिक आत्मीयता की रक्षा का पवित्र संकल्प है। यह पर्व स्मरण कराता है कि हम एक-दूसरे के सुख, सम्मान, सुरक्षा और कल्याण के प्रति उत्तरदायी हैं। रक्षा का वास्तविक अर्थ व्यक्ति को भय, निराशा, असंयम एवं अधर्म से बचाकर सत्य, सदाचार और आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रतिष्ठित करना भी है। सायंकालीन सत्संग संगोष्ठी में "पूज्य आचार्यश्री' ने सनातन धर्म के व्यापक और सर्वसमावेशी स्वरूप की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति संयम, अनुशासन, सदाचार, सेवा, सह-अस्तित्व और आत्मीयता की संस्कृति है। यह मनुष्य को अधिकारों से पहले कर्तव्यों, उपभोग से पहले त्याग और व्यक्तिगत सुख से ऊपर समष्टि के कल्याण की प्रेरणा देती है। #AvdheshanandG_Quotes #USA #NewYork #रक्षाबन्धन
- Aug 15, 2026
"उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम, भारती यत्र संततिः।।" आज जब हम स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव से आगे बढ़कर ८०वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब हृदय गर्व और कृतज्ञता से भर उठता है। भारतवर्ष केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, अपितु एक जीवंत सनातन चेतना है। इसकी आत्मा में “वसुधैव कुटुम्बकम्” का दिव्य भाव रचा-बसा है। यही भाव आज वैश्विक पटल पर पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और स्वीकार्य हो रहा है। सम्पूर्ण विश्व अब भारत के आध्यात्मिक मूल्यों, ज्ञान-आलोक, आर्षविद्या, योग और आयुर्वेद की ओर आकृष्ट हो रहा है। ये केवल प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करने वाले शाश्वत सूत्र हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जिस प्रकार सर्वसमर्थ और सशक्त राष्ट्र के रूप में अपना स्थान सुदृढ़ किया है, वह ऐतिहासिक है। रक्षा, अंतरिक्ष, डिजिटल क्रांति, अर्थव्यवस्था, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा सांस्कृतिक कूटनीति सभी दिशाओं में हमारी प्रगति स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है। विश्व मंच पर भारत का स्वर अब अधिक प्रभावी, आत्मविश्वासपूर्ण और मार्गदर्शक बन चुका है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों की गहराई और आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रमाण है। परन्तु यह यात्रा अभी अधूरी है। स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति, समरसता और आत्मनिर्भरता की प्राप्ति है। आओ ! हम सब एकजुट होकर संकल्प लें कि हमारा भारत अजेय बने; किसी भी चुनौती के सामने झुकने वाला नहीं। समरस बने; जहाँ विविधता में एकता का दिव्य संगीत गूँजे। सुसम्पन्न बने; जहाँ प्रत्येक नागरिक समृद्धि और अवसर का अधिकारी हो। सुसंस्कृत बने; जहाँ ज्ञान, नैतिकता और संस्कार जीवन का आधार हों और सबसे बढ़कर आत्मनिर्भर बने; जो अपनी शक्ति से विश्व का मार्गदर्शन करे, न कि किसी पर निर्भर रहे। "स्वतंत्रता दिवस" केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य का आह्वान है। आइए ! हम सब मिलकर उस भारत का निर्माण करें जिसका स्वप्न हमारे पूर्वजों ने देखा था; एक ऐसा भारत जो ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ हो, करुणा का सागर हो और विश्व-कल्याण का ध्वजवाहक बनकर विश्व का नेतृत्त्व करे। 80वें "स्वतंत्रता दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ। जय हिन्द ! वन्देमातरम् !! #वंदेमातरम् #भारत_माता_की_जय #स्वतंत्रता_दिवस #AvdheshanandG_Quotes #IndependenceDay
- Aug 19, 2026
वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।। कोटि-कोटि ब्रह्माण्डनायक पूर्ण परात्पर ब्रह्म भगवान प्रभु श्रीराम के दिव्य चरित्र को जन-जन के हृदय में प्रतिष्ठित करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी महान भक्त, अद्वितीय कवि, गंभीर दार्शनिक और लोकमंगल के महामनीषी थे। उन्होंने ऐसे संक्रमणकाल में जन्म लिया, जब समाज राजनीतिक अस्थिरता, सांस्कृतिक विघटन, धार्मिक आडंबर और नैतिक निराशा से ग्रस्त था। उस विषम परिस्थिति में श्रीतुलसीदास जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से जनमानस में विश्वास, भक्ति, सदाचार और आत्मगौरव का संचार किया। उनकी अमर कृति "श्रीरामचरितमानस" केवल भगवान श्रीराम की कथा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्यों का महासागर है। इसमें धर्म, ज्ञान, भक्ति, नीति, करुणा, त्याग, सेवा और मर्यादा का अनुपम समन्वय मिलता है। तुलसी के राम निर्गुण ब्रह्म के सगुण-साकार स्वरूप हैं। वे परमात्मा होते हुए भी आदर्श पुत्र, भ्राता, मित्र, पति और लोकनिष्ठ शासक के रूप में मानवता को कर्तव्यपालन का मार्ग दिखाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ज्ञान, कर्म और भक्ति को परस्पर विरोधी नहीं माना। उनके अनुसार निर्मल हृदय, निष्कपट प्रेम और अनन्य समर्पण से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है ! निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा ।। उनका दर्शन संसार से पलायन नहीं, बल्कि लोकसेवा और परोपकार की प्रेरणा देता है। उनका प्रसिद्ध कथन - "परहित सरिस धरम नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई" धर्म को मानवीय करुणा की सर्वोच्च भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। तुलसीदास की काव्य-प्रतिभा भी विलक्षण थी। उनकी भाषा में संस्कृत की गरिमा, अवधी की मधुरता और लोकवाणी की सहजता है। उन्होंने गहन दार्शनिक सत्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर शास्त्रीय ज्ञान को जनसाधारण की संपत्ति बना दिया। उनका श्रीरामचरितमानस पढ़ा ही नहीं जाता, बल्कि गाया, सुना और जीवन में उतारा जाता है। आज के मर्यादाहीन और भौतिकतावादी युग में तुलसी का साहित्य हमें सिखाता है कि शक्ति के साथ संयम, ज्ञान के साथ विनय, स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व और समृद्धि के साथ करुणा आवश्यक है। भक्ति, दर्शन, काव्य और लोकमंगल के अमर साधक गोस्वामी तुलसीदास जी की पावन जन्म-जयन्ती पर शत-शत नमन। #तुलसीदास_जयंती #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Quotes
- Jul 28, 2026
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।। द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यन- श्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।६।। (चतुर्थोऽध्यायः) श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उपनिषद्-साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं गहन प्रतीकों में से एक है। यही मन्त्र ऋग्वेद तथा मुण्डकोपनिषद् में भी प्राप्त होता है। भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य ने अपने शांकरभाष्य में इसे जीव, ईश्वर तथा आत्मसाक्षात्कार के रहस्य को उद्घाटित करने वाला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना है। अद्वैत वेदान्त की सम्पूर्ण साधना का सार इस एक प्रतीक में समाहित है। उपनिषद् कहता है कि एक ही वृक्ष पर दो सुन्दर पक्षी अभिन्न मित्रों की भाँति निवास करते हैं। उनमें से एक वृक्ष के मधुर फलों का आस्वादन करता है, जबकि दूसरा कुछ भी भोगे बिना केवल साक्षीभाव से सब कुछ देखता रहता है। यह केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव जीवन का आध्यात्मिक रूपक है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार यह वृक्ष संसार है। व्यापक अर्थ में यह शरीर, मन, बुद्धि तथा कर्मों से निर्मित संसार-वृक्ष है, जिसकी जड़ अविद्या है, शाखाएँ कर्म हैं और फल सुख-दुःख, हर्ष-विषाद तथा जन्म-मरण के विविध अनुभव हैं। यही अश्वत्थ-वृक्ष भगवद्गीता में भी वर्णित है। इस वृक्ष पर स्थित पहला पक्षी जीव है। वह वास्तव में शुद्ध, नित्य और अविनाशी आत्मा ही है, किन्तु अविद्या के कारण स्वयं को शरीर और मन के साथ अभिन्न मान बैठता है। यही तादात्म्य उसे कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता बना देता है। वह कभी सुख से प्रसन्न होता है, कभी दुःख से व्यथित; कभी सफलता में गर्व करता है तो कभी असफलता में निराश हो जाता है। उसके समस्त अनुभव कर्मफल के विविध स्वाद मात्र हैं। उपनिषद् ने इन्हीं अनुभवों को पिप्पल-फल कहा है। यह फल कभी मधुर प्रतीत होता है तो कभी कटु, किन्तु दोनों ही अनित्य हैं। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि संसार के समस्त भोग आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते, क्योंकि सीमित वस्तुएँ असीम चेतना की प्यास को कभी नहीं बुझा सकतीं। दूसरा पक्षी ईश्वर है- परमात्मा, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी और नित्यमुक्त। वह उसी वृक्ष पर स्थित होकर भी किसी कर्मफल का भोक्ता नहीं है। वह केवल साक्षी है। न वह कर्म से स्पर्शित होता है, न सुख-दुःख से विचलित। वह सूर्य के समान सबको प्रकाशित करता है, किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता। शांकरभाष्य का अत्यन्त सूक्ष्म निष्कर्ष यह है कि जीव और ईश्वर वस्तुतः दो स्वतंत्र परम सत्ताएँ नहीं हैं। यह द्वैत केवल उपाधियों के कारण प्रतीत होता है। जीव अज्ञानोपाधि से सीमित प्रतीत होता है और ईश्वर मायोपाधि से जगत् का अधिष्ठाता। उपाधियों का अतिक्रमण होने पर दोनों में कोई भेद शेष नहीं रहता। वही एक अखण्ड ब्रह्म दोनों का वास्तविक स्वरूप है। यही अद्वैत वेदान्त का परम सिद्धान्त है। जब तक अज्ञान है, तब तक जीव स्वयं को भोक्ता मानता है; ज्ञान के उदय पर वह जान लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप सदा से शुद्ध साक्षी आत्मा ही था। इस मन्त्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर मानो दो स्तर विद्यमान हैं। एक मन इच्छाओं, स्मृतियों, अपेक्षाओं और अनुभवों में उलझा रहता है; दूसरा भीतर का मौन साक्षी है, जो बिना किसी विकार के सबका अवलोकन करता है। ध्यान, आत्मचिन्तन और विवेक का उद्देश्य इसी साक्षी का बोध कराना है। जब साधक बार-बार स्वयं को साक्षी के रूप में स्थापित करता है, तब कर्मफल का आकर्षण क्षीण होने लगता है। वह अनुभव करता है कि सुख-दुःख मन की अवस्थाएँ हैं; आत्मा इन सबसे परे है। तब संसार बन्धन न रहकर आत्मबोध का साधन बन जाता है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार मोक्ष कोई नई उपलब्धि नहीं, अपितु अपने वास्तविक स्वरूप का स्मरण है। जैसे बादलों के हटते ही सूर्य स्वयं प्रकट हो जाता है, वैसे ही अविद्या के निवृत्त होते ही आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप प्रकाशित हो उठता है। तब भोक्ता और साक्षी का भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि ज्ञात होता है कि दोनों का आधार वही एक अद्वितीय ब्रह्म है। अतः यह मन्त्र केवल दो पक्षियों की कथा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अमर प्रतीक है। एक पक्षी अज्ञानग्रस्त जीव है, दूसरा सर्वज्ञ साक्षी परमात्मा; और आत्मज्ञान का परम क्षण वह है, जब साधक अनुभव करता है कि दोनों कभी वास्तव में पृथक् थे ही नहीं। वही एक शुद्ध, नित्य, मुक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म सबके भीतर समान रूप से विराजमान है। यही अद्वैत सत्य मानव जीवन का परम पुरुषार्थ, समस्त वेदान्त का चरम निष्कर्ष तथा भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य के शांकरभाष्य का दिव्य सन्देश है। #श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त #भगवत्पादाचार्य #AvdheshanandG_Quotes
- Aug 15, 2026
लन्दन, इंग्लैंड में राष्ट्रभक्ति और गौरव के साथ 80 वाँ "स्वतंत्रता दिवस" समारोह मनाया गया !! लन्दन, 15 अगस्त, 2026 भारत के त्याग, तपस्या और असंख्य वीरों के बलिदान की पावन स्मृति में आज लन्दन के "हैम्पस्टेड गार्डन सबर्ब" (Hampstead Garden Suburb) में भारतीय मूल के प्रवासी नागरिकों के साथ श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद गुरुदेव श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज "पूज्य आचार्यश्री" ने 80वाँ "स्वतंत्रता दिवस" बड़े हर्षोल्लास एवं राष्ट्रभक्ति की भावना के साथ मनाया। "पूज्य आचार्यश्री" ने भारतीय समुदाय के साथ "स्वतंत्रता दिवस" मनाते हुए राष्ट्र आराधना, मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता तथा भारत की सनातन सांस्कृतिक चेतना को स्मरण किया। “पूज्य आचार्यश्री" की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित यह "स्वतंत्रता दिवस" समारोह भारत की गौरवशाली परम्परा, राष्ट्रप्रेम और विश्वभर में भारतीय संस्कृति की जीवन्त उपस्थिति का प्रेरणादायी प्रतीक बना। "पूज्य आचार्य श्री" ने भारतीय संस्कृति की महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत ऐसा महान देश है, जो समस्त विश्व के सुख, सम्मान और कल्याण की कामना करता है। समारोह के अनन्तर उपस्थित भारतीय समुदाय ने उत्साहपूर्वक “भारत माता की जय” का उद्घोष किया। स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में घरों पर तिरंगा भारत का “राष्ट्रीय ध्वज” भी फहराया गया और सभी ने भारत राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं समृद्धि का संकल्प लिया। ====================== श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा की आचार्यपीठ (गुरुगद्दी) श्री हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार में पूज्य आचार्यश्री के पावन निर्देशानुसार आज हरिहर आश्रम, कनखल एवं भारतमाता मन्दिर, भूपतवाला, हरिद्वार में 80वाँ "स्वतंत्रता दिवस" अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। भगवत्पाद भगवान आद्य शंकराचार्य की पावन प्रेरणा, भगवान श्रीदत्तात्रेय, देवाधिदेव भगवान मृत्युञ्जय महादेव, भगवान पारदेश्वर तथा सिद्धिप्रदाता रुद्राक्ष की आत्मिक उपस्थिति से अनुग्रहीत इस आद्यपीठ ने शताब्दियों से राष्ट्रीय एकता के रक्षण-संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। "गायन्ति देवाः किल गीतकानि धान्यास्तु ये भारतभूमिभागे । स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात ।।" इसके अनन्तर, सम्पूर्ण विश्व को एकता और समन्वय का अद्भुत मंत्र देने वाले भारत माता के परम आराधक, निवृत्तमान शंकराचार्य, पद्मभूषण, श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मलीन परमगुरुदेव भगवान् पूज्यपाद श्री स्वामी सत्यमित्रानन्द जी महाराज की सद्प्रेरणा से स्थापित विश्व प्रसिद्ध "भारत माता मन्दिर" में भी स्वतंत्रता दिवस का यह पावन पर्व अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर श्री हरिहर आश्रम के व्यवस्था प्रमुख पूज्य श्री स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर पूज्य श्री स्वामी ललितानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी नित्यानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी ज्ञानानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य श्री स्वामी दत्त गिरि जी महाराज, श्री उदय नारायण पाण्डेय जी, श्री हरिहर जोशी जी, श्री सुनील मिश्रा जी, श्री चन्द्रप्रकाश अग्रवाल जी सहित आश्रम के सभी प्रमुख सन्तवृन्द, वैदिक ब्राह्मण एवं आचार्यगण, अधिकारी गण, अन्तेवासी एवं श्रद्धालु साधकों की उपस्थिति रही। ================== "स्वामी अवधेशानन्द पब्लिक स्कूल" चम्पावत में हर्षोल्लास से मना "स्वतंत्रता दिवस" !! चम्पावत, 15 अगस्त 2026 । राष्ट्र के गौरव, त्याग और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की स्मृति में आज जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्रीस्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज द्वारा संस्थापित "स्वामी अवधेशानन्द पब्लिक स्कूल", चौराख्याली, चम्पावत (उत्तराखण्ड) में "स्वतंत्रता दिवस" अत्यन्त हर्षोल्लास एवं राष्ट्रभक्ति की भावना के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर विद्यालय की प्राचार्या, शिक्षकगण एवं छात्र-छात्राओं ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराकर राष्ट्र के प्रति अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त की। सम्पूर्ण विद्यालय परिसर ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत उद्घोषों से गूँज उठा। समारोह ने विद्यार्थियों में देशप्रेम, राष्ट्रीय एकता, कर्तव्यबोध और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को और प्रगाढ़ किया। यह आयोजन भारत की गौरवशाली स्वतंत्रता, वीरों के अमर बलिदान और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के प्रति संकल्प का प्रेरणादायी प्रतीक बना। #AvdheshanandG_Quotes #IndependenceDay #80वाँ_स्वतंत्रता_दिवस #HariharAshram #भारतमाता_मन्दिर #स्वामी_अवधेशानन्द_पब्लिक_स्कूल
- Aug 8, 2026
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।। घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।१६।। (चतुर्थोऽध्यायः) यह मन्त्र अद्वैत वेदान्त के परम रहस्य को अत्यन्त सुन्दर उपमा के माध्यम से उद्घाटित करता है। जैसे मथित घृत का श्रेष्ठतम सार उसके सूक्ष्मतम मण्ड में निहित होता है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् का परम सार वह शुद्ध चैतन्य है, जिसे उपनिषद् यहाँ शिव कहकर सम्बोधित करता है। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार यह शिव कोई सीमित देवता नहीं, अपितु वही निरुपाधिक, सर्वव्यापक, अद्वैत ब्रह्म हैं, जो प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मस्वरूप से गुह्य रूप में विराजमान हैं। यह मन्त्र साधक को स्थूल से सूक्ष्म, दृश्य से अदृश्य और नाम-रूप से परे उस परम तत्त्व की ओर ले जाता है, जिसके ज्ञान से समस्त बन्धन स्वतः नष्ट हो जाते हैं। ‘घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मम्’ : सार का भी परम सार ! मन्त्र का प्रथम पद अत्यन्त काव्यमय है - “घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मम्।” भगवान् आदि शंकराचार्य इस उपमा का तात्पर्य बताते हैं कि जिस प्रकार घृत का सर्वोत्तम और सूक्ष्मतम सार सहज दृष्टि से उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा भी इन्द्रियगोचर नहीं हैं। वे समस्त अनुभवों के अधिष्ठान हैं, किन्तु स्वयं किसी विषय की भाँति ग्रहण नहीं किए जा सकते। यह सूक्ष्मता आकार की नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य की है। ब्रह्म मन, बुद्धि और इन्द्रियों से परे होकर भी उन्हीं को प्रकाशित करते हैं। वे ज्ञेय नहीं, बल्कि समस्त ज्ञान के आधार हैं। ‘शिवं सर्वभूतेषु गूढम्’ : प्रत्येक हृदय में स्थित परमात्मा ! उपनिषद् कहता है - “ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्।” भगवत्पादाचार्य के अनुसार “शिव” का अर्थ है - कल्याणस्वरूप, मंगलमय, परमब्रह्म। वही परमात्मा प्रत्येक जीव के भीतर आत्मरूप से स्थित हैं। अज्ञान के कारण जीव उन्हें बाहर खोजता है, जबकि वे उसके स्वयं के चैतन्यस्वरूप में ही प्रकाशित हैं। जैसे - अग्नि लकड़ी में अप्रकट रहती है और मन्थन से प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा प्रकट होती है। वास्तव में आत्मा कभी अप्राप्त नहीं होती; केवल अज्ञान का आवरण हटता है। ‘विश्वस्यैकं परिवेष्टितारम्’ : सर्वव्यापक अधिष्ठान ! मन्त्र परमात्मा को सम्पूर्ण विश्व का एकमात्र परिवेष्टिता अर्थात् सर्वव्यापक आधार कहता है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ बाह्य आवरण नहीं, बल्कि अस्तित्व का अधिष्ठान है। जगत् का प्रत्येक नाम और रूप उसी चैतन्य पर आश्रित है। जिस प्रकार स्वर्ण प्रत्येक आभूषण में, जल प्रत्येक तरंग में और मिट्टी प्रत्येक घट में विद्यमान रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म की सत्ता से प्रकाशित है। ब्रह्म के अतिरिक्त कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं। ‘ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः’ : ज्ञान ही मोक्ष का कारण ! मन्त्र का चरम निष्कर्ष है - “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।” भगवत्पादाचार्य के अनुसार यहाँ “पाश” का अर्थ केवल लौकिक बन्धन नहीं, बल्कि अविद्या, अहंकार, राग-द्वेष, कर्म, जन्म-मरण तथा पुनर्जन्म का सम्पूर्ण चक्र है। इन सबका मूल कारण आत्मा और अनात्मा का अध्यास है। जब साधक अपने आत्मस्वरूप को परमब्रह्म के रूप में जान लेता है, तब ये समस्त बन्धन उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं; जैसे - सूर्य के उदय होने पर अन्धकार। मोक्ष किसी नए लोक की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने नित्य मुक्त स्वरूप की पहचान है। अध्यासभाष्य की दृष्टि ! भगवत्पादाचार्य अपने प्रसिद्ध अध्यासभाष्य में बताते हैं कि जीव देह, मन और इन्द्रियों का मिथ्या आरोप आत्मा पर करता है। यही संसार है। ज्ञान होने पर यह अध्यास समाप्त हो जाता है। तब ज्ञानी अनुभव करता है - “नाहं देहः, नाहं मनः; अहं शुद्धचैतन्यस्वरूपो ब्रह्मास्मि।” यही इस मन्त्र का अन्तर्निहित सन्देश है। ब्रह्मसूत्रभाष्य की पुष्टि ! भगवत्पादाचार्य ब्रह्मसूत्रभाष्य में सिद्ध करते हैं कि ब्रह्म ही जगत् का उपादान और निमित्त कारण है। वही प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होकर भी किसी परिवर्तन से स्पर्शित नहीं होता। यह मन्त्र साधक को सिखाता है कि परम सत्य किसी दूरस्थ लोक में नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के अन्तःकरण में स्थित है। वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सर्वव्यापक, मंगलमय परमशिव ही सम्पूर्ण विश्व का आधार है। भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य के अनुसार जब साधक उस परमशिव का अपने आत्मस्वरूप के रूप में प्रत्यक्ष साक्षात्कार करता है, तब अविद्या, कर्म, भय, मृत्यु और संसार के समस्त पाश स्वतः टूट जाते हैं। वही ज्ञान परम मुक्ति है, वही अमृतत्व है और वही अद्वैत वेदान्त का परम निष्कर्ष है। #श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
Ranked by total interactions across everything we have tracked for this account, which is a longer history than the 30-day window the rates above use. The multiple compares each post to this account's own median.
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A typical post picks up 435 interactions against 324K followers, an engagement rate of 0.134%. Measured over 44 original posts, its engagement rate beats 70% of 6,874 tracked accounts of a similar size, which puts it in the middle of its size range rather than at either end. Posts are seen about 6.5K times each, and 6.65% of those impressions turn into an interaction. That is about 2.02% of the follower count, which is the gap between an audience on paper and an audience in a timeline. Posting runs at about 1.5 posts a day over the last 30 days, with activity on almost every day in the window. Most posts go out around 01:00 UTC, and Thursday is the busiest day of the week. Of the 44 posts sampled, 100% carry an image or video. The account's strongest tracked post pulled 3.1K interactions, about 7.1x its own typical post.
- What is Swami Avdheshanand's engagement rate on X?
- Swami Avdheshanand (@AvdheshanandG) has an engagement rate of 0.134%, based on the median interactions across 44 original posts from the last 30 days against 324,189 followers. Replies, reposts and quote-posts of other people are excluded from that sample.
- Is that a good engagement rate?
- At 0.134%, Swami Avdheshanand sits above the 50th percentile of the 66,258 accounts in this comparison. Those comparison accounts are all large ones, because our scanning cadence is weighted towards big accounts, so this is a ranking among peers of similar scale rather than a ranking across X.
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- When does @AvdheshanandG post?
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